जैसे ही युवावस्था में पहुँचते हैं, स्वाभाविक रूप में स्वानुशासन का प्रमाण आवश्यकता के रूप में होता ही है। यही अभ्युदय का प्रमाण होना पाया जाता है। स्वानुशासन सर्वतोमुखी समाधान के रूप में ही प्रमाणित होता है। यही मानव संचेतना की अपेक्षा और सार्थकता है। यह शिक्षा-संस्कार कार्यों से लोक सुलभ होना पाया जाता है। जागृत मानव परंपरा में ही मानवीय शिक्षा-संस्कार सार्थक होना पाया जाता है। इस विधि से कार्य-व्यवहार विचार सम्पन्न होते हुए भाई-बहन-मित्र संबंधों में विश्वास पूर्वक सम्मान व मूल्यांकन पूर्वक परस्परता में स्नेह मूल्य को सदा-सदा प्रमाणित करना होता है। इस विधि से इन संबंधों में विश्वास, सम्मान, स्नेह मूल्य प्रधान रहता है साथ ही प्रेम मूल्य स्पष्ट होना भावी रहता है - म.वि. 56

हर मित्र, हर भाई, हर बहिन समृद्घिपूर्वक व्यवस्था में जीना ही उद्देश्य है। इस विधि से भाई-बहन सम्बन्धों में शिशु कौमार्य अवस्था से ही पूरकता को पहचानने का क्रम बना हुआ है। अन्य सम्बन्धों में कुछ आयु के बाद ही पूरकता संबंध बन पाता है। यथा गुरू-शिष्य सम्बन्ध कुछ आयु के बाद आरंभ होता है। पति-पत्नी संबंध कुछ आयु के बाद आरंभ होता है।

भाई-बहन संबध शिशुकाल से ही इंगित-निर्देशित हुआ रहता है। इनमें संस्कारों का समावेश रहना सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज सहज मानसिकता के लिए अर्पित होता ही रहता है। जैसा - हर लड़कियों को बहन के रूप में सम्बोधन करने का क्रम चाहे अपने परिवार की हो चाहे अड़ोस-पड़ोस, गाँव की क्यों न हो और भाई का सम्बोधन से सम्बन्धों का प्राथमिक अथवा आरंभिक परिचय इंगित होना पाया जाता है फलस्वरूप क्रम से विचार, इच्छा, चिन्तन, बोध और अनुभव में प्रमाणित होना पाया जाता है। सम्बोधन आरंभिक संस्कार है, इसका प्रधान क्रिया उच्चारण है। उच्चारण के अनन्तर रूप, कार्य, व्यवहार, आचरणों के आधार पर गुण स्वभावों को पहचानना संभव हो जाता है। यह हर शिशु में कार्यरत जीवन सहज महिमा है।

धर्म बोध अध्ययन विधि से सम्पन्न हुआ रहता ही है। गुण, स्वभाव, कार्य-व्यवहार में निहित रहता है। उसके प्रमाणों, साक्ष्यों के आधार पर व्यवस्था अथवा समाधान कारक होना मूल्यांकित होता है। यही मूल्य और मूल्यांकन का महिमा है। उभय तृप्ति पाने का विधि भी यही है। अतएव शिशु, बाल्य, किशोर अवस्थाओं से ही भाई-बहनों और मित्रों का नैसर्गिकता और उसकी निरंतरता होने के आधार पर परस्पर मूल्यांकन अति सहज है। मूल्यांकन वास्तविक और सहायतापूर्ण होना स्वाभाविक है। यही पूरकता का परम उद्देश्य भी है। इस विधि से सुस्पष्ट है मित्र एवं भाई-बहन का सम्बन्ध सदा-सदा ही मूल्यांकन प्रणाली में गतित होना पाया जाता है। उभय जागृति के लिये यही सर्वोत्तम प्रणाली है। स्वाभाविक रूप में मानव परंपरा में एक भाई को एक बहन, एक मित्र को एक मित्र समीचीन रहता ही है।

भाई, प्रगति के अर्थ में, बहन, उन्नति के अर्थ में है:

प्रगति :-

  • समाधान प्रधान समृद्धि सहज अपेक्षा प्रक्रिया और प्रमाण।।

मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था अर्थात्‌ परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी।

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