की पहचान, संस्कार (स्वीकारने के लिए निर्देशन) का स्रोत भी है। सम्बंधों के आधार पर, संबोधनों का होना सहज है।
उल्लेखनीय (ध्यान देने योग्य) मुद्दा यह है कि मां ही प्रथम प्रधान कारण है कि वह बोली, भाषा, खान-पान में, संबोधन में विश्वास को स्थापित करती है। संबोधन से सम्बंधों में विश्वास स्थापित करना सहज है। इसी क्रम में जाति, धर्म, कर्म का मूल संस्कार भी, अधिकांश रूप में मां से संतानों को अंतरित-निक्षेपित होता है। शैशव बाल्य अवस्था में बालक विश्वास को आधार मानता है। मां पर संतानों का विश्वास होना एवं पोषण संरक्षण होना सहज रूप में देखा जाता है।
इस धरती पर जितनी भी समुदाय परंपराएं हैं, वे सब किसी न किसी नस्ल, रंग, रहस्यात्मक धर्म, संप्रदाय, पंथ, मत, भाषा, देशत्व वाली मानसिकता एवं संस्कारों को प्रदान करती हैं।
अधिकार, पद, शोषण मूलक धन और समर शक्ति के आधार पर ग्रसित समुदाय, जाति और भाषा पर आधारित समुदाय के रूप में स्पष्ट है। जबकि इस धरती पर अनेक समुदाय के लोग रहते हैं। प्रत्येक समुदाय में विभिन्न भाषावादी लोगों के होते हुए, सम्बंधों में, संबोधन का अर्थ अधिकांश समान है। यह मानव सहज अभिव्यक्ति है। प्रत्येक देश, भाषा, काल में, मनुष्य की परस्परता में, संबोधन सहज रहा है। इसका अर्थ भी सहज रहा है। ये दोनों स्थितियां अपने आप में प्रमाणित करती हैं कि सम्बन्ध अस्तित्व-सहज रूप में रहता ही है। फलत: सम्बोधन व अर्थ प्रकाशित होता है।
मानव, अस्तित्व सहज प्रकाशन है, साथ ही जागृति क्रम में प्रकाशन है। यह प्रत्येक मनुष्य में प्रमाणित होता है। प्रत्येक मनुष्य सुख धर्मी है। सुख की अपेक्षा में ही मानव समस्त सम्बन्धों को पहचानने व निर्वाह करने के क्रम में है। यह मनुष्य में दृष्टव्य है। मनुष्य का संबोधन के साथ सम्बन्धों का अर्थ एवं आचरण समेत सहज होना पाया जाता है।
माता ही शरीर का पोषण, भाषा का पोषण, नाम का पोषण, परिचयों का पोषण, संस्कृति का पोषण करने के क्रम में संस्कारों का निक्षेपण सहज रूप में करती है। प्रत्येक मां अपनी संतान को सम्बंधों का सम्बोधन, प्रारंभिक अवस्था में सिखाती है और जैसे ही उम्र बढ़ती है, वैसे ही सम्बोधन के साथ गौरव, विश्वास, सेवात्मक आचरणों को सिखाती है। यहां पर मानव को, मानवीयता के नाते सम्बोधनों एवं आचरणों को सिखाना आवश्यक है। जिससे सभी समुदाय चेतना, मानव संचेतना में विलय हो सके। मानव में मानवीयता पूर्ण संस्कार पोषण, बुनियादी कार्य है। प्रत्येक व्यक्ति में यह महत्वपूर्ण कार्य मां से आरंभ होता है, यही मानव संस्कृति की अंकुरण क्रिया है। मानव जाति और धर्म, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था रूपी सत्य को, स्थापित करना, मानव संस्कार है। सम्बन्धों की पहचान, शिष्टता का अभ्यास, मानव संस्कार है। मानव जाति, मानव में मानवीय सम्बन्ध, मानव समाज, मानवीय व्यवस्था (संविधान मानवीयता पूर्ण मानव का आचरण) के प्रति अवधारणाओं को स्थापित करना शिक्षा संस्कार है।
आरंभिक अथवा बुनियादी कार्य माता-पिता अथवा अभिभावकों और बंधुओं से सम्पन्न होता है। दूसरा, शिक्षा संस्थानों में दृढ़ होता है। राज्य व्यवस्था, संविधान पूर्वक पूर्ण एवं मूल्यांकित व प्रमाणित हो पाता है। इस प्रकार मां का पोषण कार्य शरीर, संस्कार, शिक्षा, व्यवहार, आचरण की बुनियाद है।