में अभिभूत रहने की स्थिति और गति, जिनमें हो - अभिभावक) . ऐसी स्थिति में परिभाषा में, कहे गए सभी स्वीकृत सूत्र अभ्युदय के लिए आवश्यक होते हैं, यह भी स्पष्ट है। अभ्युदय का स्वरूप, सार्वभौम तत्व है। - म.वि. 58

2. भाई – बहिन

भाई - बहिन / भाई :- एकोदर (एक उदर = पेट से पैदा होने वाले) को भाई का संबोधन है।

  • भाई और बहन के सम्बन्ध को सौहार्द-भाव के नाम से जाना जाता है – इसमें परस्पर विकास की प्रत्याशा एवम् होड़ है। इसमें दोनों पक्षों का ह्रास दोनों पक्षों को ही सहनीय नहीं होता। एक का विकास दूसरे पक्ष के विकास को आप्लावित कर देता है। जैसे यदि कोई बहिन किन्हीं विशेष सद्गुणों से संपन्न है तो इसके कारण बहिन स्वयम् में जितना आप्लावित है उतना ही अथवा उससे अधिक आप्लावन भाई में पाया जाता है। इसी प्रकार भाई का भाई के साथ अथवा बहिन का बहीन के साथ पाया जाता है।
  • परन्तु उसके विपरीत भाई अथवा बहिन में अपने दूसरे भाई अथवा बहिन के भौतिक समृद्धि के संदर्भ में परस्पर आप्लावन नहीं पाया जाता। अपितु यदि किसी भाई अथवा बहिन के पास भौतिक सम्पत्ति एकत्र हो जाय तो दूसरा भाई अथवा बहिन उसमें से कुछ हिस्सा पाने की आशा रखते हैं, परन्तु भाई अथवा बहिन को प्राप्त भौतिक समृद्धि के प्रति जो गौरव है, उससे वे पूरा का पूरा प्रसन्न होने में असमर्थ होते हैं। (व्य.द. 1978, 158)

भाई-बहन की पहचान एक निश्चित आयु में हो पाती है। पहचान होते ही परस्परता में सच्चाई, समझदारी और परिवार सम्मत अथवा जागृत मानव परिवार सम्मत अपेक्षा के अनुसार, कौमार्य अवस्था में आज्ञापालन सहयोग और अनुसरण जैसे कार्यों में परस्पर मूल्यांकन होना पाया जाता है। यही मित्रों के साथ भी होता है। जब भाई-बहन इन मुद्दों पर मूल्यांकन करने लगते हैं तब भी अभिभावक और गुरुजनों के साथ आज्ञापालन संबंध रहता ही है। अनुसरण भी इन्हीं दो पक्षों से जुड़ा रहता है। मूल्यांकन में ये सब बात स्पष्ट होना स्वाभाविक रहता है। जहाँ तक सहयोग की अभिव्यक्ति है, इसमें एक दूसरे को अधिकाधिक सटीकता की और विचार अथवा प्रकाशित होने की संभावना बनी ही रहती है।

कौमार्य और युवावस्था के बीच भाई-बहन, भाई-भाई, बहन-बहन; के परस्परता में अनुशासन की बात आती है। अनुशासन आज्ञा पालन के क्रम में एक पक्षीय हो पाते हैं। अनुशासन गुरुजनों व अभिभावकों से जीने में प्रमाणित रहने के आधार पर, अनुशासन बोध संतानों में होना स्वाभाविक है। इन्हीं तथ्य के आधार पर, हर मानव संतान अनुशासन को अपने विचारों से जोड़ना शुरु करता है। उसी के साथ आवश्यक-अनावश्यक तथा उपयोगी, अनुपयोगी विधा में भी वैचारिक प्रयुक्तियाँ होना स्वाभाविक रहता है। इस प्रकार अनुशासन आवश्यकता, उपयोगिता के आधार पर स्वीकृत होना शुरु होता है। शनै:-शनै: हर मानव संतान क्रम से अनुशासन में दक्ष होना पाया जाता है। इन सभी विधाओं में मानव संतान गुजरता हुआ अर्थात् आज्ञापालन, अनुशासन प्रक्रिया से, सोच विचार प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ अपने आप में निश्चय की प्रक्रियाएँ आरंभ होते ही यही निश्चयन प्रक्रिया सुस्थिर होना ही आज्ञापालन और अनुशासन के आशय रहता ही है।

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