पिता- संरक्षण
संतान को, संतान के रूप में स्वीकार किये हो, ऐसी स्थिति में वे अभिभावक (अभ्युदय भावना सम्पन्न) अपने बच्चों का संरक्षण करते हैं यह एक सर्वसाधारण क्रिया है।
प्रधानत: पिता संरक्षण में, माता पोषण में सर्वाधिक रूप में प्रमाणित होते हैं या होना चाहते हैं। संरक्षण का प्रधान कार्य स्वास्थ्य, शिक्षा- संस्कार, संस्कृति-सभ्यता, आचरण और मूल्यों का आस्वादन, ये प्रधान मुद्दे हैं।
स्वास्थ्य संरक्षण :- सन्तान का संरक्षण शरीर और मानसिकता के अर्थ में स्पष्ट है। शरीर संरक्षण अभ्यास से, संतुलित आहार योजना से रोग निवारण उपायों से संभव हो पाता है। मानवीय संस्कारों से, मानवीय शिक्षा से, मानवीयता पूर्ण आचरण से, मानसिक संरक्षण सहज ही हो पाता है। जहां तक शरीर संरक्षण के क्रिया कलाप हैं, वह सर्वाधिक लोगों को विदित हैं। यह यथा स्थिति होते हुए, इसका सामान्य विचार करना भी, आवश्यक है। - म.वि. 103–105
हर जागृत अभिभावक इन पांच विधियों में, से, के लिए स्वीकारते हैं, तभी पुत्र पुत्री का सम्बन्ध जागृत परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी के रूप में स्वीकार होता है। यह माता पिता का अधिकार, स्वीकृति अथवा मान्यता का स्वरूप है। इनमें से स्वयं की जागृति के अनुरूप, निर्वाह करता हुआ, देखने को मिलता है।
- शरीर रचना की कारकता सहज स्वीकृति और जीवन जागृति में पूरकता बराबर पिता।
- पोषण सुरक्षा की स्वीकृति
- संतानों में आवश्यकीय आजीविका का स्रोत अथवा आधार रूप में स्वयं को स्वीकारना।
- शिक्षा संस्कार प्रदान करने में सक्षम योग्य स्वीकारना (मानना)।
- सम्पूर्ण ज्ञान प्रावधानित करने के लिए स्वयं में स्वीकारना (मानना) - म.वि. 56
अभिभावक जितना जागृत रहते हैं, उसी के अनुरूप संतानों की सर्वतोमुखी सम्पदा का संरक्षण होना सहज है। शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ अभिभावक ही स्वस्थ संतानों को प्रस्तुत कर पाते हैं। स्वस्थ वे हैं, जिनमें मानवीय संचेतना विकसित हो चुकी हो। समुदाय चेतना संपन्न व्यक्ति का, मानसिक रूप से स्वस्थ होना संभव नहीं है। मानवतावादी विचार संपन्न, मानवीयता पूर्ण आचरणरत, मनुष्य ही, स्वस्थ मानस संपन्न होता है। अस्तु प्रत्येक मानव को, मानवीयता के प्रति जागृत रहना अनिवार्य है। यही स्वस्थ संतान को प्रस्तुत करने का सूत्र है। शरीर संरक्षण सामान्य रूप में निर्वाह होता है।
संस्कार, नाम-जाति, धर्म, दीक्षा, शिक्षा सहज रूप में आवश्यक है। नाम संस्कार संबोधन के अर्थ में, जाति संस्कार - मानव जाति के अर्थ में, धर्म संस्कार मानव-धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) के अर्थ में, दीक्षा-संस्कार जीवन जागृति, स्वानुशासन के अर्थ में सार्थक है। - म.वि. 106
पुत्र-पुत्री सम्बन्ध की, धारक वाहकता जागृत माता-पिता में होना, सहज है। इन जागृति के मूल में अभ्युदय आकांक्षा, सभी में रहती है। इसीलिए माता पिता संतान के लिए, अभिभावक होते हैं। (अभ्युदय की कामना, कल्पना - योजना