1. पिता-माता एवं पुत्र-पुत्री संबंध

माता-पिता के संबंध में पुत्र-पुत्री के साथ मातृ भाव में शरीर भाव प्रधान रहता है तथा पितृ संबंध में बौद्धिक विकास की भावना प्रधान रहता है। मूल रूप में माता पोषण तथा पिता संरक्षण स्वरूप है। माता एवं पिता के बिना संतान का संवर्धन तथा विकास संभव नहीं है। परस्परता में आशा प्रत्याशा रहता है। फलत: हर माता-पिता अपने संतान में उस दिशा में पूर्ण विकास की कामना करते हैं जिस दिशा में वह स्वयं को अपूर्ण अनुभव करते हैं - व्य.द, १९७८, १५६

माता पिता की पहचान हर मानव संतान किया ही रहता है। शिशुकाल की स्वस्थता का यह पहचान भी है। अतएव माता-पिता जिन मूल्यों के साथ प्रस्तुत होते हैं, वह ममता और वात्सल्य है। ममता मूल्य के रूप में पोषण प्रधान क्रिया होने के रूप में या कर्त्तव्य होने के रूप में स्पष्ट है। इसलिए मां की भूमिका ममता प्रधान वात्सल्य के रूप में समझ में आती है। ममता मूल्य के धारक-वाहक ही स्वयं में माँ है तथा पिता वात्सल्य प्रधान ममता के रूप में समझ में आता है।

अभिभावक सन्तान का अभ्युदय ही चाहते हैं। कुछ आयु के अनन्तर इसका प्रमाण चाहते हैं।

माता एवं पिता हर संतान से उनकी अवस्था के अनुरूप प्रत्याशा रखते हैं। उदाहरणार्थ शैशवावस्था में केवल बालक का लालन पालन ही माता-पिता का पुत्र-पुत्री के प्रति कर्त्तव्य एवं उद्देश्य होता है तथा इस कर्त्तव्य के निर्वाह के फलस्वरूप वह मात्र शिशु की मुस्कुराहट की ही अपेक्षा रखते हैं। कौमार्यावस्था में किंचित शिक्षा एवं भाषा का परिमार्जन चाहते हैं। इसी अवस्था में आज्ञापालन प्रवृत्ति, अनुशासन, शुचिता, संस्कृति का अनुकरण, परंपरा के गौरव का पालन करने की अपेक्षा होती है। कौमार्यावस्था के अनंतर संतान में उत्पादन सहित उत्तम सभ्यता की कामना करते हैं। सभ्यता के मूल में हर माता-पिता अपने संतान से कृतज्ञता (गौरवता) पाना चाहते हैं तथा केवल इस एक अमूल्य निधि को पाने के लिये तन, मन एवं धन से संतान की सेवा किया करते हैं। संतान के लिये हर माता-पिता अपने मन में अभ्युदय तथा समृद्धि की ही कामना रखते हैं, इन सब के मूल में कृतज्ञता की वाँछा रहती है। जो संतान माता-पिता एवं गुरु के कृतज्ञ नहीं होते हैं, उनका कृतघ्न होना अनिवार्य है, जिससे वह स्वयम् क्लेश परंपरा को प्राप्त करते हैं और दूसरों को भी क्लेशित करते हैं। - व्य.द, अध्याय १६

माता – पोषण

पोषण = इकाई + अनुकूल इकाई।

माता जब पुत्र-पुत्रियों को पहचानती है, तभी मातृत्व का प्रसव गुण पोषण के रूप में प्रमाणित होता है। स्वभाव गति सम्पन्न प्रत्येक मां अपनी संतान को पहचानती है, फलत: निर्वाह करती है। इसी कारणवश, संतान की शरीर स्वस्थता और मानसिकता का, माता की योग्यता व साधन के अनुसार अथवा परिवार की दक्षता अनुसार पोषण सम्पन्न होता है, जो संस्कार कहलाता है। मां अपनी संतान की, स्वीकृत मानसिकता का स्रोत है। साथ ही भाषा, संबोधन, सम्बंधों

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