विश्वास के अलावा कुछ करता ही नहीं। परम्परा में, विश्वास सहज धारक वाहकता प्रमाणित होने के उपरान्त, परम्परा में आए (अथवा अवतरित) सभी मानव संतान, शिशु काल की विश्वास निष्ठा को जागृत परम्परा सहज रूप में ही अपनाए रखते हैं। इसका मार्ग प्रशस्त हो जाता है। – म.वि. 50

3. सम्मान 4. सौहाद्रता

सम्मान :-

व्यक्तित्व प्रतिभा की स्वीकृति और उसका सन्तुलन सहज प्रकाशन

  • व्यक्तित्व, प्रतिभा की श्रेष्ठता की स्वीकृति निरन्तरता स्पष्टता।
  • व्यक्तित्व एवं प्रतिभा में श्रेष्ठता सहज प्रमाण का पहचान, स्वीकृति - प्रमाणित होने की प्रवृत्ति
  • व्यक्तित्व का तात्पर्य - आहार, विहार, व्यवहार के रूप में प्रमाणित होना। व्यक्तित्व - आचरण, प्रतिभा = समझदारी।
  • प्रतिभा का तात्पर्य - जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन व मानवीयतापूर्ण आचरण में पारंगत होना।
  • सौहार्द :-

जिस प्रकार से स्वीकृति हो उस अवधारणा, अनुभव, स्मृति और श्रुति को यथावत प्रस्तुत करने का क्रियाकलाप।

  • स्पष्टता से मूल्यांकन, क्रियाकलाप में स्पष्टता, सार्थकता।– म.वि. 50
  • सम्मान अथवा सम्मानात्मक मानसिकता तभी संभव हो पाती है, जब मूल्यांकन विधियों को जानने-मानने, पहचानने और निर्वाह करने की आवश्यकता महसूस होती है।मूल्यांकन सहज आवश्यकता, जागृत जीवन का कार्यक्रम प्रमाण सहज प्रक्रिया है। किसी भी आयाम, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य में, श्रेष्ठता की स्वीकृति सहित प्रकाशन ही, सम्मान के रूप में समर्पण पूर्वक स्पष्ट होता है। मूल्यांकन के साथ अरहस्यता स्वाभाविक ही वर्तमान रहता है, फलस्वरूप मूल्यांकन की संप्रेषणा, भाषा, मुद्रा, भंगिमा - अंगहार सहित संप्रेषित हो पाती हैं। – म.वि. 54

5. स्नेह 6. निष्ठा

स्नेह :-

न्यायपूर्ण व्यवहार में निर्विरोधिता

संतुष्टि, प्रसन्नता, उत्सव में, से, के लिए स्वयं स्फूर्त मिलन और निरंतरता।

  • अभ्युदय में, से, के लिए स्वयं स्फूर्त उभय मिलन एवं उसकी निरंतरता।
Page 160 of 335