कार्य भरपूर सम्पन्न होता है और संरक्षण कार्य, सहजता से संपन्न हो जाता है। इस प्रकार प्रधानत: पोषण कार्यों में ममता सहित मातृत्व को और ममता सहित संरक्षण कार्यों को पितृ सम्बंध में होना पाया जाता है। पितृ सम्बंध संरक्षण पोषण रूप में ममता व उदारता मूल्य व मूल्यों के रूप में, सम्पन्न होना, पाया जाता है। ममता और उदारता, मानव परम्परा में, संतानों के साथ, सहज ही वर्तमान होने वाला आचरण है। – म.वि. 48
9. वात्सल्य 10. सहजता
वात्सल्य
सर्वतोमुखी समाधान के अर्थ में पोषण संरक्षण
- सहजता
स्पष्टता एवं प्रामाणिकता।
- व्यवहार, रीति, विचार एवं अनुभव की एकसूत्रता।
- वत्स (पुत्र-पुत्री) रूपी सम्बन्ध बोध के साथ ही वात्सल्य रूपी मूल्य का प्रकाशन होता है। यह वात्सल्य संतान व संतानवत् सम्बंधों का बोध सहित प्रत्येक परिवार मानव में देखने को मिलता है। सन्तान का रूप बोध होना, लोक व्यापीकृत है। संतान का अर्थ बोध होना अपरिहार्य है। परिवार मानव को सन्तान में, पारिवारिक अर्थ बोध होना सहज है। वात्सल्य सम्बंध बड़े बुजुर्गों के साथ माता-पिता के साथ गुरू-आचार्यवत् व्यक्तियों के साथ वात्सल्य सम्बंध स्वीकृत होना पाया जाता है। संतानवत स्वीकारने का महत्वपूर्ण तथ्य इतना ही है कि तन, मन, धन का ऐसे वात्सल्य सम्बंध को निर्वाह करता हुआ व्यक्ति, नियोजित करता हुआ देखने को मिलता है। जैसे कोई भी सामान्य सज्जन परिवार में संतान होता है।
उनके लिये उस सम्बंध के साथ उपलब्ध तन, मन रूपी अर्थ का नियोजन करते हैं। मूलतः मानव अपेक्षा हर सम्बंधों की अक्षुण्णता के अर्थ में आरंभ होता है। मानव जब जागृत परम्परा में होता है तब सम्पूर्ण सम्बंध और उसमें निहित मूल्यों की अक्षुण्णता बनी ही रहती है। फलतः परिवार में अक्षुण्णता, समाज में अक्षुण्णता का प्रमाण बना ही रहता है। इससे यह पता चलता है कि जीवन जागृति पूर्वक हम मानव सम्बंध और मूल्यों की अक्षुण्णता को बनाये रख पाते हैं। सम्बंध और मूल्य कभी भी समाप्त नहीं होता है यह भी तथ्य सामान्य लोगों को पता है। मूल्य यथावत बना ही रहता है सम्बंध भी बना ही रहता है, निर्वाह होता ही है।
सम्पूर्ण सम्बंध मानव की जिज्ञासा के अनुसार सम्बन्धों का संबोधन प्रचालित है। इन सभी सम्बन्धों में शुभेच्छा ही सर्वाधिक लोगों में आकलित होता है। मानव सहज प्रयोजनों के अर्थ में सम्बन्धों की दृढ़ता में निरंतरता रहता ही है। ऐसी दृढ़ता के आधार पर ही जागृति पूर्वक निष्ठा सहज स्वीकार होना पाया जाता है। सम्पूर्ण निष्ठा में मानव अपने दायित्व कर्तव्यों को स्वीकारने की स्थिरता होना पाया जाता है फलस्वरूप व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी सहज हो जाता है।