निष्ठा :-

  • मानवीयता पूर्ण विचार व्यवहार में निरंतरता, मानवीयता सहित व्यवस्था सहज वर्तमान
  • जागृति पूर्ण लक्ष्य को निश्चित अवधारणा व स्मरण पूर्वक प्राप्त करने व प्रमाणित करने का निरंतर प्रयास। – म.वि. 55

स्नेह सम्बंध भी स्वयं स्फूर्त सम्बन्ध है। इसमें निहित आशय और प्रक्रिया भी स्पष्ट हो चुकी है। इसमें निरंतरता को बनाए रखना ही निष्ठा है। निष्ठापूर्वक ही सम्पूर्ण सम्बन्ध सफल हो पाते हैं। स्वयं स्फूर्त विधि ही, संतुष्टि का आधार बिंदु है। इसीलिए उभय संतुष्टि है क्योंकि हर सम्बन्ध में एक से अधिक व्यक्तियों का होना पाया जाता है। इसलिए उभय संतुष्टि (अथवा जो जो संबंधित रहते हैं, संतुष्टि क्रम में) स्नेह सम्बंध का निरंतर वैभवित होना पाया जाता है। – म.वि. 55

7. ममता 8. उदारता

ममता :-

  • अपनत्व की पराकाष्ठा पूर्वक पोषण संरक्षण कार्य।
  • स्वयं की प्रतिरूपता की स्वीकृति, उसकी निरंतरता।

उदारता :-

  • स्व प्रसन्नता पूर्वक, दूसरों की जीवन जागृति, शरीर स्वस्थता व समृद्घि के लिए आवश्यकता अनुसार तन, मन, धन रूपी अर्थ का अर्पण-समपर्ण करना।
  • प्राप्त समाधान रूपी सुख सुविधाओं (समृद्घि) का, दूसरों के लिए सदुपयोग करना और प्रसन्न होना।
  • प्रतिफलापेक्षा विहीन कर्त्तव्य दायित्व वहन, तन मन धन अर्पण।

ममता की परिभाषा, सूत्र और व्याख्या ममत्व के (मेरा पन के) आधार पर ही हो पाती है। यह मन में होने वाली अनुभवमूलक प्रमाण के आधार पर, कल्पनाशीलता (व्यावहारिक तरीकों) को संयत कर पाता है। यह शिशुकाल में सर्वाधिक रूप में माता-पिता के चरित्र में अथवा अभिभावकों के चरित्र में दिखने वाला तथ्य है।

शुभ सहज के स्वरूप में, जागृति न होते हुए भी मानव शुभाकांक्षा करता है। ममता सहज प्रभाव, भले ही अभिभावक, भ्रमित क्यों न रहते हों, जब तक ममता का भाव (मूल्य) रहता है, तब तक उदारता पूर्ण चरित्र प्रकाशित रहता है।

उदारता पूर्वक जब मनुष्य अपने आचरण को प्रस्तुत करता है, तब अपने पास जो कुछ भी तन, मन, धन रूपी अर्थ होता है उसे प्रसन्नता और उत्सव के रूप में ही, अर्पण- समर्पण करना प्रमाणित होता है। यह प्रधानत: मात्रात्मक रूप में अधिकाधिक व्यक्त हो पाता है। इसमें अर्थात् ममता सूत्र में निष्ठा, पूर्णतया अभिव्यक्त होती है। ममतावश पोषण

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