हर मूल्य का अनुभव मुद्रा, भंगिमा, भाव, अंगहार सहित सम्बंधों में व्यक्त होना पाया जाता है। वात्सल्य के साथ जैसे भाषा को पीछे रखकर भाव प्रभावित हो जाता है।
वात्सल्यता अपने आप में भावी पीढ़ी में जागृति को सार्थक बनाने में निश्चयन के साथ उत्सवित रहने का उद्गार ही वात्सल्य कहलाता है। – म.वि. 230-231
11. श्रद्धा 12. पूज्यता
श्रद्घा :-
श्रेय की ओर गतिशीलता अर्थात् आचरण पूर्णता की ओर गुणात्मक परिवर्तन।
- जागृति और प्रामाणिकता की ओर गति व उसकी निरंतरता।
- प्रामाणिकता, श्रेष्ठता की ओर प्रवृत्ति एवं संकल्प सहित गति
- पूज्यता:-
गुणात्मक विकास और जागृति के लिए सक्रियता।
- गुणात्मक परिवर्तन के लिए सक्रियता
- जीवन वैभव क्रम में अथवा जागृति क्रम में जो प्रेरणा, प्रमाण, कर्माभ्यास, व्यवहारभ्यास व चिंतनाभ्यास है, उसके लिए प्राप्त सूत्र, व्याख्या, प्रेरणा, लक्ष्य और दिशा निर्देशन एवं स्वीकृतियां जीवन सहज हैं। इन सबका प्रयोग जीवन जागृति के लिए ही है। ऐसी प्रेरणा एवं निर्देशों को पाने के पहले से ही जीवन जागृति अथवा मोक्ष के प्रति तीव्र जिज्ञासा का होना देखा जाता है मोक्ष का तात्पर्य भ्रम मुक्ति से है। भ्रम मुक्ति (का तात्पर्य) जागृति से ही है। जागृत परम्परा में हर मानव को जागृति पूर्वक भ्रममुक्ति सहज है। नियति क्रम में भ्रम मुक्ति अथवा जीवन जागृति निश्चित है। जीवन ही जागृति पर्यन्त जिज्ञासु रहना जागृति सहज आवश्यकता को महसूस करता पाया जाता है।
सार्थकतावश पूज्यता कृतज्ञता सहित जीवन जागृति पद में प्रतिष्ठित होने के लिए ही समझदार जागृत और प्रमाणित मानव के सान्निध्य में स्वाभाविक रूप में पूज्यता पूर्वक जिज्ञासा सहित प्रस्तुत होना पाया जाता है। ऐसी स्थिति में प्रेरणाओं को पाकर जो गति निर्मित होती है अर्थात् चिंतन प्रधान गति पहचान में आती है उसी का नाम श्रद्घा है। दूसरी भाषा में यही तथ्य इंगित होता है, वह है श्रेय की ओर दिशा गतिशीलता। ऐसी गतिशीलता के लिए प्राप्त सभी प्रेरणाओं से ऐसा जागृत प्रेरणाशील जागृत मानव के प्रति परम पूज्यता का प्रकाशन होता ही है। इस प्रकार श्रेय की ओर गतिशीलता श्रद्घा है और उसके लिए प्राप्त दिशा दर्शन लक्ष्य सहज स्पष्टता और स्वीकार पूर्वक ही प्रेरक के प्रति पूज्यता का प्रकाशन सहज होना पाया जाता है। – म.वि. 235, 236