13. गौरव 14. सरलता
गौरव:-
- निर्विरोध पूर्वक, अंगीकार किए गए अनुकरण।
- विकसित (जागृत) को पहचान एवं उनके अनुरूप होने में उत्साह और निरंतरता
सरलता :-
- ग्रंथि व तनाव रहित अंगहार, एवं उसका प्रकाशन
विकसित, जागृत मानव, मूल्यों का निर्वाह करते हुए मूल्यांकन पूर्वक श्रेष्ठता का गौरव पाता और करता है। गौरव स्वयं मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के अर्थ में (अथवा स्वीकार किया हुआ के अर्थ में) प्रतिपादन, अभिव्यक्ति व संप्रेषणा है। ऐसी अभिव्यक्ति, संप्रेषणा सरलता पूर्वक होना पाया जाता है। सरलता अपने में जिस गौरव को व्यक्त करती है, उसके लिए किया गया शरीर विन्यास, सम्पूर्ण आवेशों से मुक्त स्वभाव गति सम्पन्न मानव सहज गति है। धीरता, वीरता, उदारता पूर्ण, मुद्रा, भंगिमा, अंगहारों की अभिव्यक्ति है। गौरव क्रिया-कलाप में सार्थकता की स्वीकृतियां, सर्वाधिक प्रभावशील रहती हैं। फलस्वरूप सरलता सहज ही सम्यक होती है।
अस्तु, श्रेष्ठता, मनुष्य के जीवन जागृति पूर्वक में होने वाली अभिव्यक्ति है। श्रेष्ठता, प्रत्येक मनुष्य को स्वीकार्य है। श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति में, सरलता पूर्वक सम्मानित करना पाया जाता है। जागृति पूर्वक ही मानव पद प्रतिष्ठा प्रमाणित होता है। – म.वि. 133
15. कृतज्ञता 16. सौम्यता
कृतज्ञता:-
जिस किसी की भी सहायता से उन्नति (विकास और जागृति) की प्राप्ति में सफलता मिली हो, उसकी स्वीकृति।
- प्राप्त सहायता उपकार के प्रति स्वीकृति प्रसन्नता व निरंतरता की स्वीकृति
- सौम्यता:-
स्वेच्छा से स्वयं का नियंत्रण।
- स्वयं स्फूर्त प्रणाली, की पद्धति से स्वयं का नियंत्रण
- जीवन जागृति क्रम में (अथवा विकास में ) जिस किसी से भी सहायता प्राप्त हुई हो, उसे स्मरण में रखना और स्वीकारना तथा स्वीकार किये हुए को अभिव्यक्त करना, कृतज्ञता है। यह समाधान में, से, के लिए सहायक प्रक्रिया