है। जीवन ही जागृति पूर्वक, समाधान का धारक-वाहक होता है। सम्पूर्ण जागृति, समाधान और प्रामाणिकता के रूप में प्रमाणित हो जाना ही, मानव परम्परा की गरिमा व महिमा है। मानव समाधान पूर्वक ही, सुख और शांति का अनुभव करता है। – म.वि. 129
17. प्रेम 18. अनन्यता
प्रेम:-
पूर्णानुभूति
- दया, कृपा, करुणा की संयुक्त अभिव्यक्ति। पूर्णता में रति व उसकी निरंतरता।
- अनन्यता:-
मनुष्य की परस्परता व नैसर्गिकता में पूरक क्रियाकलाप।
- प्रामाणिकता व समाधान में निरंतरता। अविकसित के विकास में सहायक क्रिया। जागृति पूर्ण पहचान।
- प्रेम ही जीवन में पूर्ण मूल्य है। अनन्यता ही प्रधान शिष्टता है, जो प्रेम को अभिव्यंजित करने में समर्थ है। प्रेममयता ही विवेक सम्पन्न एवं अभयता का अनुभव है। यह संबोधन क्रम से स्थापित सम्बंधों को ज्ञान कराता है। प्रत्येक सम्बंध में, स्थापित मूल्य प्रसिद्ध है। प्रत्येक सम्बंधों की चरितार्थता केवल वर्तमान में विश्वास एवं सम्पूर्ण सम्बंधों की पहचान मूल्यों का निर्वाह ही है - जो जीवन का लक्ष्य और कार्यक्रम है। प्रत्येक चैतन्य इकाई जीवन पद में है, जीवन जागृति पूर्वक प्रेम और अनन्यता को दया, कृपा, करुणा के संयुक्त रूप में प्रमाणित करता है। प्रेमानुभूति स्वयं स्वतंत्रता स्वानुशासन के रूप में प्रमाणित होता है। अस्तित्व में अनुभूति पूर्वक ही प्रेमानुभुति और अभिभूति प्रमाणित होता है। स्वतंत्रता जीवन का लक्ष्य है। अभिभूति ही नियम नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म सत्य सहज विधि से पूरक होने का प्रमाण है। पूरक होने का प्रमाण मानव सम्बंधों के नैसर्गिक सम्बंधों में सार्थक होना पाया जाता है। मानव सहज मानव संचेतना का प्रमाण सहजता के आधार पर स्वानुशासन सहज ही सार्थक होना पाया जाता है। प्रेमानुभूति का प्रधान लक्षण अनन्यता है। प्रत्येक मनुष्य, अपने से विकसित के साथ अनन्यता को स्थापित करता है। यह जागृति परम्परा की महिमा है। - म.वि. 223
(i) मानव सम्बन्ध एवं प्रयोजन
मानव संबंधों को सात प्रकार से नाम सहित प्रयोजनों को इंगित कराया है। संबंध क्रम से पोषण, संरक्षण, अभ्युदय, जागृति, प्रामाणिकता, जिज्ञासा, यतित्व, सतीत्व, विकास-प्रगति, दायित्व-कर्तव्य प्रयोजनों का स्वरूप है। इन