संबंध का पहचान मूल्यों का निर्वाह ही परिवार समाज एवं व्यवस्था है। जन्म, जीवन, व्यवहार विशिष्ट, शिष्ट, नीति एवं उत्पादन विनिमय वैभव से संबंध प्रसिद्घ हैं।

  • जन्म संबंध = माता-पिता एवं भाई-बहन, पति-पत्नि, पुत्र-पुत्री
  • जीवन-जीवन संबंध = गुरु-शिष्य, जागृत सभी संबंध
  • शिष्ट-शिष्ट संबंध = मित्र, साथी-सहयोगी
  • नीति-नीति संबंध = विधि, व्यवस्था, संस्कृति एवं सभ्यता
  • उत्पादन- (*विनिमय) संबंध = क्षमता, अवसर, साधन एवं वितरण (*साथी-सहयोगी)

संबंधों में निहित मूल्यवत्ता-वश ही उसकी अक्षुण्णता पाई जाती है। यही अखंड समाज की अक्षुण्णता भी है।

मूल्यों की स्थिरता ही अखंडता एवं अक्षुण्णता है, जो नियति क्रम में पाये जाने वाले तथ्य हैं। समाज की पाँचों स्थितियाँ परस्पर पूरक हैं, जिसकी एकसूत्रता ही अखंडता है। अन्तर्राष्ट्रीय जीवन में ‘‘नीतित्रय’’ का संतुलन, राष्ट्रीय जीवन में मानवीयता के संरक्षण एवं संवर्धन योग्य विधि-व्यवस्था एवं शिक्षा-प्रणाली-पद्घति, सामाजिक जीवन में मानवीयता का प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन एवं प्रोत्साहन; परिवार-जीवन में मानवीयता के प्रति समर्पण, विश्वास एवं निष्ठा, व्यक्ति के जीवन में मानवीयता पूर्ण आचरण, व्यवहार, अभ्यास अनुभव, विचार, व्यवहार, उत्पादन तथा आवश्यकता से अधिक उत्पादन ही लोक मंगल-कार्यक्रम है। यही चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों की एकसूत्रता का सूत्र है।

प्रत्येक मानव में सीमित शक्ति, निश्चित दायित्व, कर्तव्य एवं स्थापित संबंध पाये जाते हैं, जिनकी एकसूत्रता ‘‘नियम त्रय’’ एवं मानवीयता पूर्ण पद्घति से प्रमाणित होती है। यही गुणात्मक परिवर्तन का औचित्य और मानव की आचार संहिता है। – अ.द. 26-28

परिवार ही बुनियादी व्यवस्था, न्याय एवं शिक्षा है। प्रत्येक मानव के जीवन जागृति और प्रमाणित होने का आधार भी यही है।

मानव का प्रथम परिचय परिवार में स्पष्ट होता है। प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन व्यवहार में प्रमाणित होता है एवं आचरण-प्रकटन का भी परिवार ही बुनियादी क्षेत्र है, उसकी विशेषतानुसार ही विशाल एवं विशालतम सीमा सिद्घ होती है।

समग्रता के अध्ययन को सुलभ बनाना एवं विधि व्यवस्था को सफल बनाना ही मानवीय संस्कृति सभ्यता की अक्षुण्णता को पाना है। यही व्यवहारात्मक जनवाद का प्रत्यक्ष रूप है।

मानव जागृति के अर्थ में गुणात्मक एकता की संभावना है, भोगात्मक भ्रमात्मक एकता की संभावना नहीं है। – अ.द. 43

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