(iii) स्थापित मूल्य सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक हैं – शाश्वत हैं, निरंतर हैं

स्थापित संबंधों में निहित स्थापित मूल्यों का परिवर्तन किसी भी देश, काल व स्थिति में नहीं है। यही स्थायित्व का लक्षण और अनिवार्यता का मूल कारण है। स्थापित मूल्य, मानव मूल्य, जीवन मूल्य देशकाल से बाधित (सीमित) नहीं है। प्रत्येक संबंध में निहित स्थापित मूल्य निकट व दूर, भूत भविष्य एवं वर्तमान से प्रभावित नहीं है। प्रत्येक स्थापित मूल्य तीनों कालों में एवं सभी देशों में एक सा है।

यह अपरिवर्तनीयता स्वयं में स्पष्ट करती है कि स्थापित मूल्य ही नित्य है, जबकि प्रत्येक इकाई में पाई जाने वाली उपयोगिता एवं सुंदरता का परिणाम व परिवर्तन प्रसिद्घ है। ‘‘मूल्य मात्र अनुभव ही है।’’ (*स्थापित मूल्यों की अनुभूति एवं शिष्ट मूल्यों की अभिव्यक्ति होती है)। क्रिया में मूल्यों की स्थिति का अभाव नहीं है। उसे अनुभव करने की क्षमता के अभाव में वह रहस्य, अज्ञात एवं अप्राप्त है।

स्थापित मूल्य नौ हैं :-

1 कृतज्ञता, 2. गौरव, 3.श्रद्घा, 4. प्रेम, 5.विश्वास, 6. वात्सल्य, 7. ममता, 8.सम्मान, 9. स्नेह।

सामाजिक मूल्य मानवीयता सहज मानव आचरण के आधार है। इनमें से विश्वास ‘‘साम्य’’ मूल्य है और ‘‘प्रेम’’ पूर्ण मूल्य है। व्यवहार निर्वाह काल में उक्त स्थापित मूल्यों के साथ आचरण-प्रक्रिया (शिष्टता) रहती है, जो क्रमश: सौम्यता, सरलता, पूज्यता, अनन्यता, सौजन्यता, सहजता, उदारता, सौहार्द्रता तथा निष्ठा है। यही शिष्टता है, जो स्थापित मूल्य में समर्पित रहती है, जो प्रसिद्घ है।।

भौतिक समृद्घि के लिए ही मानव उत्पादन करता है, जिसकी उपयोगिता महत्वाकाँक्षा व सामान्य आकाँक्षा की सीमा में निहित है। यह भी जीवन का अविभाज्य आयाम है। यह स्पष्ट है कि उत्पादन ही मानव जीवन का सर्वस्व नहीं है। यही कारण है कि मानव सामाजिक, आर्थिक, राज्यनीति को पालन करने के लिए बाध्य है।

व्यवहारात्मक जनवाद का आधार केवल ‘‘न्याय’’ ही है, क्योंकि प्रत्येक मानव जन्म से ही न्याय का याचक है। यही ‘‘नीतित्रय’’ की समन्वयता की एकसूत्रता का भी कारण है साथ ही जनवादी चिंतन, निरीक्षण व स्पष्टीकरण का आधार भी है। व्यवहार का आधार न्याय ही है।

मानव की परस्परता में आश्वस्त एवं विश्वस्त होने का आधार न्याय ही है।

अखण्ड समाज परम्परा में स्थापित मूल्य का निर्वाह ही शिष्टता की अभिव्यक्ति तथा ‘‘अर्थ’’ का सदुपयोग है। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जीवन में एकसूत्रता ही ‘‘न्याय’’है। यही सार्वभौम कामना है, जो व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार में, परिवार के सहयोग एवं सहकार्य में, समाज के प्रोत्साहन एवं प्रेरणा में, राष्ट्र के संरक्षण तथा संवर्धन में एवं अंतर्राष्ट्रीयता के अनुकूल परिस्थिति एवं एकसूत्रता में चरितार्थ होती है। यही सर्व-मानव की कामना, मांगल्य शुभ, संगीत, वांछनीय अनिवार्यता, ऐतिहासिक उपलब्धि, नियतिक्रम स्थिति, अखंडता, अभयता, सतर्कता एवं स्वर्ग है। - अ.द., 31-33

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