- दायित्व को निर्वाह न करने पर स्वयं का विकास, जिसके साथ निर्वाह करना है उसका विकास तथा इन दोनों के विकास से जिन तीसरे पक्ष का विकास हो सकता है वह सभी अवरूद्ध हो जाते हैं। विकास को अवरूद्ध करना ही शोषण है।
- दायित्व का अपव्यय अथवा सद्व्यय करना -दायित्व के निर्वाह में आलस्य एवं प्रमाद पूर्वक प्राप्त प्रतिभा और वर्चस्व का न्यून मूल्य में उपयोग करना ही दायित्व का अपव्यय है।
दायित्व का विरोध करना अथवा पालन करना - मौलिक मान्यताएं जो संबंध एवं सम्पर्क में निहित हैं उसके विरोध में ह्रास के योग्य मान्यता को प्रचारित एवं प्रोत्साहित करना ही दायित्व का विरोध करना है। दायित्वों का विरोध अभिमानवश एवं अज्ञानवश किया जाता है। - व्य.द. १९७८, अध्याय १६
(v) जागृति पूर्वक ही सम्बन्ध निर्वाह हैं
सम्बंधों को पहचानना, निर्वाह करना तभी संभव हो पाता है जब जीवन ज्ञान अस्तित्वदर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण में पारंगत हो जाये इसी के लिए मानव परम्परा में बहुआयामी प्रयास की आवश्यकता है। – अ.द. 43
दूसरे के पहचान कर (लेने से) जीने का विश्वास होना पाया जाता है। जागृत मानव अपने प्रतिभा और व्यक्तित्व की पहचान बनाने में तत्काल समर्थ होता है। इसमें कठिनाई तभी आती है जब भ्रमित आदमी के साथ अथवा भ्रमित आदमी जागृत आदमी के साथ जीना होता है इस विधि से निष्कर्ष को पाना आवश्यक है ही।
जागृत आदमी के साथ एक या अनेक भ्रमित आदमी जीने की स्थिति में जिम्मेदारी जागृत आदमी की ही होती है कि भ्रमित आदमी को जागृत पद के लिये और जागृति के लिए प्रेरित करे। मूलतः एक पक्ष जागृत रहना मुख्य मुद्दा है।- ज.व. 69-71
अस्तित्व ही नित्य व्यक्त अभिव्यक्त है क्योंकि अस्तित्व सदा-सदा स्थिर, शाश्वत है, नित्य वैभव है। इन्हीं तथ्यों से यह भी ज्ञात होता है कि अस्तित्व में, से, के लिये कोई रहस्य व कोई अवरोध एवं संघर्ष नहीं है। विरोध नहीं है, विद्रोह नहीं है, विपन्नता नहीं है। बड़े-छोटे के रूप में कुंठा-निराशा नहीं है। युद्घ व शोषण नहीं है। ये सभी नकारात्मक पक्ष मानव के द्वारा अपनाया हुआ भ्रमित परम्परा का देन है। – स.श. 197
जागृतिपूर्वक ही सम्बन्ध स्वीकृति अवधारणा में हो पाता है यही एक संस्कार है। ऐसी अवधारणा ही सम्बन्धों का प्रयोजन सहज सत्य के रूप में स्वीकृत होना देखा गया। यह क्रिया जागृत जीवन शक्तियों का दर्शन क्रियाकलाप के फलस्वरूप घटित होना देखा गया है। जागृत जीवन बल ही मूल्य और मूल्यांकन में प्रस्तुत होता है। फलस्वरूप समाधान समीकृत (फलित) होता है। यही मानव धर्म सहज सुख का स्रोत है। यह स्रोत प्रत्येक मानव में जागृत जीवन के रूप में वैभवित होना पाया जाता है। – स.श. 197