(iv) सम्बन्ध में मूल्याङ्कन, दायित्व, कर्तव्य निर्वाह
जो जिसका मूल्यांकन नहीं करेगा वह उसका सदुपयोग नहीं करेगा या नहीं कर सकेगा। अत: मानव के हर पक्ष का मूल्यांकन आवश्यक है।
सम्पूर्ण संबंधों के मूल में मूल्यांकन आवश्यक है। मूल्यांकन मौलिकता का ही होता है। मौलिकता के आधार पर ही कर्तव्य का निर्धारण तथा निर्वाह होता है। दायित्वों का निर्वाह जिस इकाई के प्रति होना है उस इकाई के प्रति न होने से उसका पोषण अवरूद्ध होता है अथवा शोषण है साथ ही जिस इकाई द्वारा दायित्व का निर्वाह होना है उसे, न होने की स्थिति में प्रतिफल के रूप में अविश्वास ही मिलेगा। अविश्वास ही द्रोह, विद्रोह तथा आतंक का कारण बनता है जो शोषण की ओर प्रेरित करता है।
प्रत्येक संबंध में सम्पर्क निहित है ही। संबंध में भाव (मौलिकता) पक्ष विशिष्ट है तथा भौतिक पक्ष गौण है। प्रत्येक संबंध में भाव का जितना तिरस्कार होता है भौतिक पक्ष उतना ही प्रबल होता है। संबंधों मे भाव का निर्धारण मानवीय परम्परा के अनुसार है। संबंधों के निर्वाह में भाव पक्ष का तिरस्कार कर भौतक पक्ष को वरीयता प्रदान कर जब आचरण किया जाता है तो अपने से अविकसित को विकास का लक्ष्य मान लेने की भ्रमित मान्यता का जन्म होता है जबकि समस्त भौतिक पक्ष मनुष्य से अविकसित है ही। इसलिए विकास का मार्ग अवरूद्ध होता है। परिणाामतः मानवों ने भौतिक उपलब्धियों के लिए ही युद्ध किया है।
अत: संबंध में भाव पक्ष का तिरस्कार ही उस संबंध का शोषण है।
अत: यह सिद्ध है कि समस्त संपर्कात्मक तथा सम्बन्धात्मक व्यवहार से भौतिक तथा भावात्मक शोषण एवं पोषण है। वर्तमान में भौतिक शोषण को अधिक महत्व दिया है तथा भावात्मक शोषण को उपेक्षित किया है। जबकी ह्रास की गति भावात्मक शोषण के फलस्वरूप तीव्र गति से और भौतिक शोषण से धीमी गति से है, क्योंकि भाव पक्ष भौतिकता से अति विकसित है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि विकास बौद्धिकता में है, जो सहअस्तित्व के रूप में परिलक्षित होता है तथा भौतिकता में कोई विकास नहीं होती बल्कि उपयोगिता और उपभोग बढ़ जाता है।- व्य.द. 1978, 149-50
मानव के लिए पोषण युक्त संपर्कात्मक एवं संबंधात्मक विचार एवं तदनुसार व्यवहार से ही मानवीयता की स्थापना संभव है, अन्यथा, शोषण और अमानवीयता की उपलब्धि है।
शोषण और पोषण तीन प्रकार से होता है।
दायित्व का निर्वाह करने से पोषण अन्यथा शोषण है। प्राप्त दायित्वों में नियोजित होने वाली सेवा के नियोजित न करते हुए मात्र स्वार्थ के लिए जो प्रयत्न है एवं दायित्व के अस्वीकारने की जो प्रवृत्ति है उसको दायित्व का निर्वाह न करना कहते हैं।