जीवन जागृत होने में कोई भी, कितना भी भ्रमित परिकल्पनाएं बाधा का कारण नहीं हो पाता है, जैसे-विविध रंग, जाति, वर्ग, देश, भाषा, लिंग, नस्ल। यह सभी मिलकर अथवा किसी एक जो मानव में विविधता का कल्पना समा लिया वह सब जागृति के सम्मुख होने के स्थिति में अपने आप विलय हो जाता है। एक सूत्र में सभी व्यर्थ-अनर्थ, पाश्वीय-राक्षसी कल्पनायें मानवीयता सहज जागृति के प्रभाव के साथ साथ ही सभी भ्रम, निर्भ्रम (जागृति) में विलय हो जाते हैं। जैसे एक गणित का प्रश्न का, सही उत्तर पाने के लिये प्रक्रिया-प्रयास तब तक किया जाता है जब तक सही उत्तर पाया नहीं गया। जब सही उत्तर समझ में आ जाती है उसी के साथ-साथ गलती करने वाला विविध भ्रम अपने-आप उत्तर ज्ञान में विलय हो जाता है। विलय होने का तात्पर्य इतना ही है जिसका प्रभाव शेष नहीं निःशेष हो जाता है। – स.श. 197–198
सम्बन्ध का स्वीकृति अथवा अवधारणा अपने स्वरूप में समाधान और उसकी निरंतरता ही है। यह विज्ञान और विवेक सम्मत तर्क विधि से बोध होता है। ऐसा बोध सम्पन्न होने का अधिकार, प्रत्येक जीवन में समाहित रहता ही है। यहाँ यह भी स्मरण में रहना आवश्यक है कि जीवन ही दृष्टा, कर्ता और भोक्ता होता है। यह जागृतिपूर्वक ही अनुभव गम्य होता है क्योंकि बोध के अनन्तर अनुभव ही एकमात्र जागृति के लिये सोपान है। अध्ययनपूर्वक अस्तित्व बोध जीवन बोध और संबंध बोध होना देखा गया है। इन्हीं सम्बन्ध बोध में प्रयोजन रूपी समाधान को व्यक्त करना ही अथवा प्रमाणित करना ही मूल्यों का निर्वाह है। – स.श. 198
समाधान अपने स्वरूप में सुख ही है। यही समाधान सम्पूर्ण आयाम, कोण, परिप्रेक्ष्य, देश, कालों में प्रमाणित होने के क्रम में ही सर्वतोमुखी समाधान कहलाता है। हर विधाओं में प्रमाण सहज अभिव्यक्ति अनुभवमूलक विधि से ही सम्पन्न होना पाया जाता है। इसलिये सम्बन्ध अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में अनुभव होना स्वाभाविक है और जागृति का साक्ष्य है।
जागृति क्रम में जानना, मानना, पहचानना अध्ययन विधि से अध्ययनपूर्वक निर्देशन सहित बोध होना पाया जाता है। इसी क्रम में जागृत परंपरा प्रदत्त विधि से सम्बन्धों का पहचान, प्रयोजनों का बोध स्वाभाविक रूप में होना पाया जाता है। यह हर मानव संबंध, नैसर्गिक सम्बन्धों में निहित मूल्यों, मूल्यांकन, प्रयोजन के रूप में समझ में आता है। यही सम्बन्ध और मूल्य बोध होने की विधि है।
सम्बन्ध और मूल्य अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में ही होना स्पष्ट हो चुका है। शरीर और जीवन का संयोग भी सह-अस्तित्व सहज सूत्र से ही सूत्रित है। सर्वमानव भी सह-अस्तित्व में ही जीवन जागृति को प्रमाणित करने का कार्य करता है, या करना चाहता है या करने के लिये बाध्य है। सह-अस्तित्व स्वयं मानव में होने वाले अनुभव सहज स्वीकृति है। इन स्वीकृति के साथ ही प्रमाणित होने के क्रम में सम्बन्ध मूल्य, मूल्यांकन, उभयतृप्ति प्रमाणित होना पाया जाता है। यही चरित्र का चरमोत्कर्ष प्रयोजन है। ऐसे चरित्र के आधार पर ही नैतिकता स्वाभाविक रूप में सार्थक होता है। इसे भली प्रकार से परखा गया है, जीकर देखा गया है। - स.श. 201
(उपरोक्त) विश्लेषण से यह बात स्पष्ट हो गया कि जीवन जागृतिपूर्वक ही हर मानव स्वायत्तता पूर्वक परिवार मानव होने का प्रमाण सहित स्वयं में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह करता है। जीने की कला दूसरे विधि से मानवीयतापूर्ण आचरण विधि मानव सहज परिभाषा क्रम से ही मानवीयता का व्याख्या सहज ही सार्थक हो