जाता है। सार्थक होने का तात्पर्य अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था क्रम में भागीदारी है। अखण्ड समाज सूत्र परिवार विधि से सार्थक होना पाया जाता है। परिवारों का स्वरूप और विशालता को दश सोपानों में स्पष्ट किया गया है। इसी के साथ-साथ दश सोपानों में सभा-स्वरूप व्यवस्था कार्य, कर्तव्य, दायित्व को स्पष्ट किया है। परिवार क्रम में मूल्य, चरित्र, नैतिकता अविभाज्यता को सहज ही स्पष्ट किया जा चुका है। दश सोपानीय समाज रचना और व्यवस्था गति अपने-आप में एक दूसरे को संतुलित करने के अर्थ से हम अभिहित होते हैं। जैसे:- परिवार- जिसका सूत्र सम्बन्ध मूल्य, मूल्यांकन, उभय-तृप्ति और परिवारगत उत्पादन-कार्य में पूरकता फलस्वरूप परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन है। परस्पर परिवार व्यवस्था में विनिमय एक अनिवार्य कार्य है। इसी के साथ सीखा हुआ को सिखाने, किया हुआ को कराने, समझा हुआ को समझाने का कार्य प्रणाली सदा-सदा जागृत मानव पंरपरा में वर्तमान रहता ही है। इसी क्रम में सर्वमानव सुख, सर्वमानव शुभ और सर्वमानव समाधान सर्वसुलभ होता ही रहता है। इस स्थिति को पाना सर्वमानव का अभीप्सा है। अतएव सुलभ होने का मार्ग सुस्पष्ट है। - स.श. 199
वस्तु मूल्यों का नियंत्रण व्यवस्था पर है। उत्पादन सिद्घ वस्तुएं आवश्यकता के आधार पर दृष्टव्य हैं, इसलिए उनका मूल्य निर्धारण उन पर स्थापित की गई उपयोगिता एवं सुन्दरता के आधार पर श्रम मूल्य ही है।
आवश्यकताएं सामयिक हैं। प्रत्येक समय में प्रत्येक मानव को प्रत्येक वस्तु की आवश्यकता समान रूप से सिद्घ नहीं होती, जबकि स्थापित संबंधों की अनिवार्यता निरंतर है, जो प्रसिद्घ है। इसलिए आवश्यकताएं सामान्य एवं महत्वाकाँक्षा की सीमा में ही हैं। इन सब का उपयोग सामयिक समाज गति के अर्थ में है। इसलिए संबंधों के निर्वाह में ही वस्तुओं के उपयोग, सदुपयोग व वितरण प्रयोजन की सीमाएं समाहित हैं। - अ.द. 31–33
मानवीयतापूर्ण जीवन ही संयत जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। इसी की सीमा में किया गया आहार, विहार एवं व्यवहार का सम्मिलित रूप ही व्यक्तित्व है। यही अभ्यास एवं जागृति में पाया जाने वाला सर्वतोमुखी विकास है। यही अभ्युदयशील होने का प्रत्यक्ष लक्षण है। इसलिए ‘‘सुख, शांति, संतोष एवं आनंद स्थापित मूल्यों के अनुभव में ही है। पूर्ण मूल्य में अनुभव ही परमानंद है।’’
सुन्दरता एवं उपयोगिता मूल्य की स्थिरता नहीं है क्योंकि उपयोगिता एवं सुन्दरता स्वयं में एक सी नहीं है, यह सामयिक है, जिसके साक्ष्य में :-
शब्द, स्पर्श, रूप, रस गंधेन्द्रियों में आवश्यकताएं सामयिक हैं।
- क्षुधा, पिपासा सामयिक हैं।
- संपूर्ण उपयोग सामयिक है।
- महत्वाकाँक्षा, सामान्याकाँक्षा से संबंधित उपयोग सामयिक हैं।
- विनियम सामयिक है।
- वस्तु व सेवा का नियोजन सामयिक है।