इसलिए उपयोगिता व सुंदरता मूल्य सामयिक सिद्घ है।

उपयोगिता मूल्यों के आधार पर समाज की स्थायी संरचना संभव नहीं है क्योंकि वह स्वयं में स्थायी नहीं है। स्थापित मूल्य ही नित्य एवं अपरिवर्तनीय है।(इसीलिए) स्थापित मूल्यों पर ही समाज संरचना की द्दढ़ता स्पष्ट है। यही सत्यता मानव को अमानवीयता से मुक्त होकर मानवीयता से सपंन्न होने के लिए प्रेरित करती है। अर्थ ही मूल्य, मूल्य ही अर्थ है। उपयोगिता-मूल्य, शिष्ट-मूल्य में एवं शिष्ट-मूल्य स्थापित मूल्य में समर्पित पाया जाता है। यही संयमता का प्रत्यक्ष रूप है।

मूल्य-दर्शन एवं अनुभव-क्षमता ही संस्कार का प्रत्यक्ष रूप है। संस्कार विहीन मानव नहीं है। मानव का संपूर्ण संस्कार मानवीयता तथा अतिमानवीयता में ही प्रत्यक्ष है।

संस्कार परिवर्तन केवल शिक्षा एवं व्यवस्था से ही है क्योंकि त्रुटिपूर्ण शिक्षा व व्यवस्था के द्वारा ज्ञानी-अज्ञानी, विवेकी-अविवेकी, सबल-दुर्बल एवं अन्य किसी को भी संतुष्टि, समाधान व अभय प्रदान करना संभव नहीं हुआ है, जो स्पष्ट है। – अ.द. 48-49

4.4 नैतिकता

(A) नैतिकता – परिचय

“मानव के लिए सदुपयोग एवं सुरक्षात्मक पोषणवादी नीति”

आवश्यकता

जागृत मानव ही स्वायत्त मानव के रूप में मूल्यांकित होना पाया जाता है। ऐसे स्वायत्त मानव स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी होने का सामर्थ्य, प्रक्रिया, ज्ञान, दर्शन विधाओं में पारंगत होता है। ऐसे मानव ही परिवार मानव के रूप में मानवीयता पूर्ण आचरण को प्रमाणित करता है। मानवीयता पूर्ण आचरण में एक (पहला) आयाम परिवार में परस्पर संबंधों को पहचानने, मूल्यों को निर्वाह करने, मूल्यांकन करने, उभयतृप्ति पाने के रूप में देखा गया है।

मानवीयतापूर्ण आचरण में दूसरा आयाम है नैतिकता, यह चरित्र के पूरकता में होना देखा गया है, वह है, तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा के रूप में सार्थक होना। अर्थात् मानवीयता पूर्ण चरित्र में, से, के लिये यह नैतिकता पूरक होना पाया जाता है। अर्थात् अर्थ का सदुपयोग विधि, सुरक्षा विधि ही नैतिकता है। इसी प्रमाण के आधार पर अर्थ का सुरक्षा विधि से सदुपयोग, सदुपयोग विधि से सुरक्षा प्रयोजन स्पष्ट होता है। इसलिये अर्थ का सदुपयोगिता सिद्घान्त सुरक्षा के लिये और सुरक्षा सिद्घान्त सदुपयोग के लिये पूरक होता है। अस्तु, इससे आचरण में नैतिकता रूपी दूसरा आयाम सहज प्रयोजन स्पष्ट है। यह सर्वमानव मानस का अपेक्षा है ही अथवा सर्वाधिक मानव का अपेक्षा है। यथा-हर मानव अपने तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा चाहता ही है। - आ.व. 158-164

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