के रूप में गति, मानव के रूप में स्थिति, प्रयोजनों के रूप में गति। समझदारी (जानना, मानना, पहचानने) के रूप में स्थिति, निर्वाह करने के रूप में गति, मानव के रूप में स्थिति, मानव जाति के रूप में गति। पुन: मानव के रूप में स्थिति, मानव धर्म (व्यवस्था) के रूप में गति होना पाया जाता है। - ज.व. 132–150

व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी, मानव परम्परा की सार्वभौमता है और उसकी निरंतरता का नित्य स्रोत है। यह जागृत जीवन सहज अभिव्यक्ति है। प्रत्येक मनुष्य में जीवन, अक्षय बल व शक्ति सम्पन्नता के रूप में विद्यमान है। इसका अभिव्यक्ति क्रम, संप्रेषणा क्रम क्रमश: अनुभव बल, विचार शैली व जीने की कला के रूप में प्रमाणित होना ही मानव परम्परा की सफलता व उसकी निरंतरता है। यही जागृति का प्रमाण है। - म.वि. 223

मानव के “स्वत्व’’, स्वतंत्रता एवं अधिकार के लिए मानव ही प्रमाणों का आधार है। प्रत्येक मनुष्य स्वयं को प्रमाणित करना भी चाहता है। मानव को प्राप्त शिक्षा-संस्कारों में प्रत्येक मनुष्य को प्रमाणित करने की अथवा प्रमाणित होने की, स्व-प्रमाणों पर विश्वास होने की अथवा कराने का स्पष्ट बिंदु, स्पष्ट विश्लेषण, स्पष्ट प्रकिया पूर्वक, स्पष्ट प्रयोजनों के साथ मनुष्य के अधिकारों को जोड़ा नहीं गया (अथवा जोड़ना संभव नहीं हुआ था)। जबकि प्रत्येक मनुष्य में जीवन समान है। जीवन शक्तियां समान है, जीवन बल समान है, जीवन लक्ष्य समान हैं, समाज-लक्ष्य समान हैं, व्यवस्था लक्ष्य समान है, (जीवन सहज समानता के आधार पर) जीवन सहज शक्ति, बल, लक्ष्य संभावनाओं की समानता के आधार पर ही, संबद्घ रहना पाया जाता है। जीवन लक्ष्य जागृति है।

इस कारण जागृति सहज मनुष्य में जानने मानने, पहचानने-निर्वाह करने की पूर्णता है और समाज तथा व्यवस्था लक्ष्य में, समानता सहज आवश्यकताएं, स्वयं स्फूर्त होना पाई जाती हैं। इस क्रम में मानव को अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का साक्षात्कार करना और इसे साकार करना सहज है। - म.वि. 74

परिवार और व्यवस्था अविभाज्य है।

परिवार और व्यवस्था अविभाज्य है। परिवार हो, व्यवस्था नहीं हो और व्यवस्था हो परिवार नहीं हो, ये दोनों स्थितियाँ भ्रम का द्योतक हैं। - अ.श. 183–185

प्रत्येक मनुष्य को परिवार और परिवार कार्यों की निश्चयता की अपेक्षा व आवश्यकता है। परिवार स्वयं में अखंड समाज एवं सार्वभौम व्यवस्था का बीज और स्रोत रूप है। - म.वि. 22

(*परिवार में ही संबंध, मूल्यों के रूप में न्याय व्यवस्था, उत्पादन एवं परस्पर परिवारों के बीच में विनिमय व्यवस्था प्रमाणित होता है। परिवार ही समाज में भागीदार होता है। इस ढंग से धर्म एवं राज्य नीति का संयुक्त अभिव्यक्ति परिवार से ही प्रारंभ होता है। अर्थात्, संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था को प्रमाणित करने का प्रथम स्थली परिवार ही है।- संवाद, २०११)

जागृत मानव ही व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण होना पाया जाता है।

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