तकनीकी सम्पन्न मानसिकता है। इसमें शरीर के अंग अवयव के संयोजन पूर्वक, हस्त लाघव सहित, श्रम नियोजन संपन्न होता है। इस विधि से मनुष्य को हमने उत्पादन कार्य में सफल होते हुए देखा है। अभी तक के उत्पादन, क्रिया कलापों में विकृति का स्वरूप, लाभोन्मादिता ही है। यह भय और प्रलोभन पर आधारित है। इसके विकल्प के रूप में “मूल्य और मूल्यांकन’’ रूपी प्रौद्योगिकी एवं “समाज व्यवस्था सूत्र’’ को व्याख्यायित और स्थापित करना इस मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान की अभीप्सा है। उक्त प्रकार से उत्पादन कार्य और उसकी मानसिकता स्पष्ट हो चुकी है।
उत्पादन ही धन है - इस प्रकार, तन, मन, धन का स्वरूप स्पष्ट हुआ है। इनकी उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता विधि से मूल्यांकन संभव हो जाता है। वस्तु का मूल्यांकन उपयोगिता और सुन्दरता के आधार पर मन का मूल्यांकन अनुभव मूलक विधि से कार्य-व्यवहार के रूप में मूल्यांकित हो जाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के साथ मूल्यांकित हो जाता है। मूल्यांकन का आधार, मानव सम्बन्ध और नैसर्गिक सम्बन्ध है। मानव परम्परा में दोनों प्रकार के सम्बन्ध वर्तमान हैं और इनका निरंतर होना पाया जाता है। मानव परम्परा मानसिकता विवेक विज्ञान विचार सम्मत होने के कारण, मनोविज्ञान की समझ जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में (अथवा मनोविज्ञान सहज सम्बन्ध) एक आवश्यकता है। स.श., 81-85
हर स्तरीय परिवार में आवश्यकता से अधिक उत्पादन एक अनिवार्य स्थिति है, सहज स्थिति है, आवश्यकीय स्थिति है। क्योंकि आवश्यकता से अधिक उत्पादन विधि से ही शरीर पोषण, संरक्षण समाज गति सम्पन्न हो पाता है। और इसके मूल में जीवन जागृति पूर्वक ही समाज गति सार्थक होता है। सार्थकता का स्वरूप सह-अस्तित्व और तृप्ति है। सह-अस्तित्व में सदा-सदा उभयतृप्ति होना देखा गया है। यह भी विश्लेषण पूर्वक स्पष्ट किया जा चुका है। इस आधार पर शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति में तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा विधि से ही सम्भावित होना देखा गया। उत्पादित वस्तु ही धन है। मन का तात्पर्य जीवन शक्तियों से व निपुणता, कुशलता, पांडित्यपूर्ण मानसिकता से है। मन और तन समेत ही मानव हर कार्य-व्यवहार करता है। जागृतिपूर्वक किये जाने वाले हर कार्य का फलन उत्पादित वस्तुओं के रूप में प्रधान रूप में मिलता है। - म.वि. 206-207
सेवा :- उत्पादन-कार्य में भागीदारी ही श्रम नियोजन का प्रधान अवसर, संभावना व आवश्यकता है क्योंकि परिवार सहज आवश्यकता, शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति के अर्थ में उत्पादन का प्रयोजन स्पष्ट होता है। इनमें आहार, आवास, अलंकार और दूरदर्शन, दूरश्रवण और दूरगमन संबंधी वस्तु व उपकरण गण्य हैं।
यह सर्वमानव में स्वीकृत है। इस प्रकार हम मानव प्रतिफल के रूप में कृषि, पशुपालन, ग्राम शिल्प, हस्तकला, कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योग और लघु-गुरु उद्योग पूर्वक सामान्याकांक्षा एवं महत्वाकांक्षा सम्बंधी वस्तुओं को श्रम नियोजन और सेवा पूर्वक प्रतिफल के रूप में पा सकते हैं। - स.श. 159
उत्पादन की भागीदारी के लिये श्रम नियोजन आवश्यक है। श्रम नियोजन पूर्वक ही मानव समृद्घ होता है। मानव में श्रम निपुणता, कुशलता एवं पांडित्य के रूप में समझदारी होना ज्ञातव्य है जो चैतन्य क्रिया का अधिकार है। इसी अधिकारवश जड़-प्रकृति की यांत्रिकता में वह परिमार्जन और परिणाम प्रदान करता है फलत: उपयोगिता एवं सुन्दरता प्रत्यक्ष होती है। चैतन्य क्रिया की यही क्षमता परिवारगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन एवं समृद्घि को प्रकट करती है। चैतन्य जीवन ही अमर है। शरीर का जन्म और मृत्यु घटना है। इस तथ्य को जानने वाला भी चैतन्य इकाई ही है।