परिवार सभा

परिवार ही मूलत: सभा के रूप में, सभा ही परिवार के रूप में वैभवित होता है।

निर्णय लेने के रूप में सभा कहलाता है। क्रियान्वयन करने के रूप में परिवार कहलाता है।

इस प्रकार परिवार और सभा अविभाज्य होना पाया जाता है। सभा में संवाद अवश्यंभावी है। जिसमें एक दूसरे की मानसिकता, प्रयोजन, फल, परिणाम का बोध होना पाया जाता है। फलस्वरूप हर निर्णय सर्वसम्मति के रूप में सार्थक होना पाया जाता है। सर्वसम्मतियाँ परिवार में ही हो पाती हैं। सभी मुद्दे समझदारी से शुरूआत होते हुए प्रमाणीकरण तक लम्बाई चौड़ाई होना पाया जाता है। मानवत्व सहज समझदारी का मूल रूप सहअस्तित्व है, प्रमाणीकरण का स्वरूप सहअस्तित्व है।

मानव कुल अपना सम्पूर्ण वैभव को प्रमाणित करने के रूप में प्रथम सोपान परिवार ही है। परिवार में जो कमी रह जाती है वह कहीं भी आपूर्ति नहीं हो पाती। परिवार में ही हर मानव शुद्घ रूप में अथवा संपूर्ण रूप में पहचान के योग्य है। परिवारजन परस्परता में जितने अच्छे तरीके से पहचान पाते हैं, परिवार के बाहर अथवा किसी दूसरे परिवार के व्यक्ति को उसके सम्पूर्ण आयाम कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों, के संदर्भ में ध्यान देना स्पष्ट होना जटिल हो ही जाता है। इसलिए हर मानव को अपने परिवार में जागृति का प्रमाण प्रस्तुत करना अभ्युदय का प्रमाण है। अभ्युदय का तात्पर्य भी सर्वतोमुखी समाधान से ही है। इस विधि से मानव इस बात पर अपने को विश्वास स्थली के रूप में पहचान सकता है कि परिवार में समझदारी से मानसिकता, मानसिकता से कार्य व्यवहार, कार्य व्यवहार से फल परिणाम, फल परिणाम से समाधान समृद्घि प्रमाणित होने के अर्थ में परस्पर निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण करना प्रत्येक परिवार सदस्यों से बन पाता है। इस क्रम में मानव अपने वैभव के सम्पूर्ण स्वरूप को स्पष्ट किया ही रहता है। यही रहस्य मुक्त परिवार है। सकारात्मक पक्ष में समाधान समृद्घि पूर्ण परिवार है और अभय, सहअस्तित्व को प्रमाणित करने योग्य परिवार है। इसे जागृत मानव परिवार के सौभाग्य के रूप में पहचानना हर व्यक्ति द्वारा जो अन्य जागृत पविार के सदस्य हैं सुगम हो जाता है इसे भली प्रकार से समझ चुके हैं। इसलिए विश्वास करते हैं कि हर मानव इसे समझते हुए अपने कार्य व्यवहारों को जागृति की कड़ी से जोड़ने का प्रयास एवं प्रमाण अवश्य ही करेंगे। - ज.व. 191-193

(iii) परिवार में उत्पादन व्यवस्था में भागीदारी

प्रत्येक मनुष्य में, तन, मन, धन रूपी अर्थ, एक दूसरे के पूरक रूप में दिखाई पड़ते हैं। मूलत: मन से ही शरीर का संचालन होना देखा जाता है। तन और मन के वियोग की स्थिति में कोई कार्य शरीर से सम्पन्न नहीं हो पाता है और मानव की संज्ञा, सार्थक नहीं हो पाती है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में वर्तमान रहना, मानव व्यवहार का आधार है। ऐसे व्यवहार कार्य के क्रम में, उत्पादन कार्य भी एक आवश्यकीय कृत्य है। उत्पादन का तात्पर्य, तन-मन सहित प्राकृतिक ऐश्वर्य अर्थात् पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था पर श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य स्थापित करना है। इसी क्रम में सम्पूर्ण महत्वाकांक्षा और सामान्य आकांक्षा सम्बन्धी वस्तुओं का उत्पादन हुआ है। इसमें निपुणता, कुशलता प्राप्त करने के क्रियाकलापों को प्रशिक्षण नाम दिया जाता है। यह पूर्णतया चित्रण सहज,

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