में होने वाला क्रियाकलाप है। जिसके आधार पर ही शरीर संतुलन बना रहना स्वाभाविक क्रिया है। इसमें वंशानुषंगीय रचना की परिपूर्णता प्रधान रूप में आवश्यक रहता ही है। यह सह-अस्तित्व में निहित विधि क्रम में वंशानुषंगीयता स्थापित रहता ही है। यही प्राण और रचना सूत्रों के रूप में होना देखा गया है। इस विधि से हमें स्पष्टतया समझ में आता है कि स्वास्थ्य संतुलन की आवश्यकता लक्ष्य के आधार पर ही आहार-विहार योजनाओं का होना देखा गया है। संतुलित आहार-विहार पद्घति इसी तथ्य पर आधारित रहता है।
शरीर को स्वस्थ रखने की कल्पना, विचार, चित्रण और मूल्यांकन लक्ष्य बोध सहज विधि से ही सुयोजित होना पाया गया है। चिन्हित रूप में शरीर की स्वस्थता जीवन जागृति की अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन योग्य विधि से उपयोगी होना ही एकमात्र लक्ष्य होना देखा गया है। यही सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज, परिवार मानव और स्वायत्त मानव तथा मानवीयता को परंपरा के रूप में स्पष्ट करना, प्रमाणित करना होता है। यही मानव परंपरा के धारकता का भी तात्पर्य है। मानव परंपरा मानवीयता के प्रति जागृत रहना एक स्वाभाविक क्रिया है। यह मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार पूर्वक सर्व सुलभ हो चुकी है। अतएव परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के पाँचों आयामों में भागीदारी को निर्वाह करना ही व्यवस्था-सहज प्रमाण पूर्वक समग्र व्यवस्था में भागीदारी का स्वरूप और गति यही मानव परंपरा का स्वस्थ गति और स्थिति होने के आधार पर स्वास्थ्य-संयमता का योजना-कार्य और मूल्यांकन सुस्पष्ट हो जाता है।
उक्त विधि से परिवार मानव अर्थात् समझदार व स्वायत्त मानव, व्यवस्था मानव और समाज मानव के रूप में प्रमाणित होना ही स्वास्थ्य-संयम का लक्ष्य है। इसे विधिवत् स्थिति गति में प्रमाणित करना ही स्वास्थ्य-संयम का प्रमाण है। इसके योग्य आहार-विहार स्वाभाविक रूप में संतुलित रूप में निर्वाह कर लेना ही यथा-आवश्यकीय व्यायाम, खेल, नृत्य, गीत, संवाद, वाद्य, कलाओं का उपयोग विहार का मतलब है। इसे स्वास्थ्य-संयम अभ्यास भी कहा जा सकता है। - म.वि. 374
(ii) परिवार में न्याय व्यवस्था में भागीदारी
परिवार सहज संबंधों में जीने के क्रम में ही न्याय समझ में आता है – संवाद. २०१२
न्याय सम्मत आचरण (जो स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार के रूप में है) तन-मन-धन रूपी अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा, सभी सम्बन्धों की पहचान एवं मूल्यों का निर्वाह ही मूल्य, चरित्र, नैतिकता रूपी आचरण वैभव है। यही सार्वभौम मानव है तथा स्वयं में व्यवस्था रूपी जागृत मनुष्य है। ऐसे जागृत मनुष्य ही समग्र व्यवस्था में भागीदार होते हैं।
तन, मन, धन का सदुपयोग विधि से वस्तु का उपयोग विधि से वस्तु का मूल्यांकन विनिमय के लिए सुलभ होते हुए परिवार में उपयोग समाज में सदुपयोग, व्यवस्था में प्रयोजनशील होने की दिशा स्पष्ट हो गयी है। - म.वि. 185।