मानव में श्रम का मूल रूप भी चैतन्य-क्रिया ही है। इस चैतन्य-क्रिया में जो संवेदनशील एवं संज्ञानशील क्षमता है, वही स्थापित मूल्यों का वहन, शिष्ट मूल्यों का प्रकटन और उत्पादित वस्तु मूल्यों का मूल्यांकन करता है और प्रमाणित होना पाया जाता है। सामाजिक जीवन में उत्पादन, उपयोग, सदुपयोग एवं विनिमय अविभाज्य अंग है। यही तथ्य जीवन में एकसूत्रता, तारतम्यता, अनन्यता और एकात्मकता को स्थापित करने के लिये प्रेरित करता है। यही स्थापना शुद्घत: व्यवस्था है। अ.द. 65-67
किसी वस्तु के उत्पादन में अकेले से कुछ होता ही नहीं है। एक से अधिक लोगों के बीच में ही किसी वस्तु का उत्पादन संभव है। मूल्यांकन के लिए एक से अधिक व्यक्तियों का होना ही है। विनिमय के लिए और व्यक्ति परिवार की आवश्यकता ही है। व्यक्ति के सीमा में कोई उत्पादन का निर्णय नहीं होता। इस बात को पहले से ही स्पष्ट किया है हर मानव किसी न किसी मानवीयतापूर्ण परिवार में प्रमाणित होगा। हर मानव बहुआयामी अभिव्यक्ति है इसलिए उत्पादन-कार्य एक आयाम है। परिवार में लक्ष्य उत्पाद है न कि श्रम ज्यादा कम। - अ.श. 249–250
(iv) विनिमय व्यवस्था में भागीदारी
हर उत्पादन मानव में निहित, मानव सहज निपुणता, कुशलता, पांडित्य सहित सहज मानसिकता पूर्वक शरीर के द्वारा प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन करने के फलस्वरूप वस्तुओं में उपयोगिता और कला मूल्य स्थापित होता है। यही उत्पादन का अथ-इति है। ऐसे उत्पादित वस्तुओं का विनिमय इसलिये आवश्यक हुई कि हर परिवार में निश्चित कुछ वस्तुओं का उत्पादन करना समीचीन, संभव और क्रियान्वित रहता है। जबकि हर परिवार को जो उत्पादन सहज सम्पन्न रहते हैं उन वस्तुओं से भिन्न अन्य वस्तुओं की आवश्यकता बनी रहती है। इसलिये विनिमय प्रणाली है। - म.वि. 206-207
विनिमय-कोष अपने परिभाषा के स्वरूप में विनिमय कार्य सम्पन्न करता हुआ और विनिमय के लिए आवश्यकीय सभी वस्तुओं को विशेषत: सामान्य-आकांक्षा संबंधी सभी वस्तुओं को श्रम मूल्य के आधार पर आदान-प्रदान करता हुआ एक क्रियाकलाप है। इसमें हर स्तरीय कोषों में उन-उन स्तरीय आवश्यकता के अनुरूप वस्तुएँ उपलब्ध रहता ही है। उन-उन स्तरों में यह समितियाँ लाभ-हानि मुक्त विधि से विनिमय करता है। इसका उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशील रूप प्रदान करना हर परिवार का ही कार्यकलाप होना देखा गया है। इस मुद्दे पर अर्थात् उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता सहज क्रियाकलापों को पहले स्पष्ट किया जा चुका है।
विनिमय-कोष लाभ-हानि मुक्त श्रम-मूल्यों का मूल्यांकन विधि से विनिमय कार्य को सम्पादित करता है, इसलिये विनिमय-कोष के स्वत्व में कोई संग्रह, किसी भी प्रकार का संग्रह देखने को नहीं मिलता है क्योंकि अस्तित्व में संग्रह का साक्ष्य नहीं है। अस्तित्व में पूरकता का गवाही है, त्व सहित व्यवस्था का गवाही है। अस्तित्व में जीवन जागृति साक्ष्य है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर विनिमय-कोष में लाभ की आवश्यकता नहीं रह जाती है क्योंकि सार्वभौम व्यवस्था और अखण्ड समाज के सूत्र में, से, के लिये और इसे नित्य सफलीभूत बनाने का प्रणाली-पद्घति-नीति में, से के लिये मानव सहज विज्ञान और विवेक सम्मत विचारों के रूप में कार्यरत रहना देखा गया है। - स.श. 313