प्रथम तीनों के स्रोत के रूप में मानवीयतापूर्ण शिक्षा संस्कार सुलभता और स्वास्थ्य संयम सुलभताएं, समाविष्ट रहती ही हैं। यही मानव परम्परा की विवेक व विज्ञान पूर्ण गति व संगति है। प्रत्येक मनुष्य व्यवस्था को ही वरता है। व्यवस्था में, से, के लिए समृद्घि सहज है। अस्तु स्वयं व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के वैभव क्रम में ही उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनीयता प्रमाणित होती है। साथ ही आवश्यकता से अधिक उत्पादन से, शोषण विहीन विनिमय से तथा न्याय सुलभता से वर्तमान में विश्वास होता है। - म.वि. 63,65

जीना कम से कम तीन आयामों में स्वयं स्फूर्त विधि से सम्पन्न होता है। तभी व्यवस्था में जीने का रस और सुख अपने आप मिलने लगता है। ऐसे तीन आयाम को न्याय सुलभता (न्याय प्रदायिता एवं पाने में सुलभता), उत्पादन सुलभता और विनिमय सुलभता पूर्वक ही हर परिवार व्यवस्था में जीता हुआ अनुभव करता है। ज्यादा से ज्यादा मानव, मानवीयतापूर्ण व्यवस्था में पाँचों आयामों में अपने भागीदारी को प्रमाणित करता है। यह उक्त तीनों के साथ शिक्षा-संस्कार सुलभता और स्वास्थ्य-संयम सुलभता है। इन्हीं व्यावहारिक आधारों के कारण मानव को जागृत और जागृतपूर्ण स्थितियों में देखा गया है। यह सबके लिये समीचीन है। इन्हीं दो स्थिति को क्रम से क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता का नाम दिया है। आचरण की विशालता में ही विशाल, विशालतर और विशालतम व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न होना सहज है। सम्पूर्ण प्रक्रिया का सफल स्वरूप समाधान और समृद्घि के रूप में मूल्यांकित होता है। अभय, सह-अस्तित्व मानवीयता पूर्ण आचरण का फलन है। इन तथ्यों को भली प्रकार से देखा गया है। इस प्रकार हर परिवार मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार पूर्वक स्वायत्त मानव और परिवार मानव के रूप में जीते हुए व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण प्रस्तुत करना सहज है। सहजता का तात्पर्य जागृति पूर्वक प्रमाण सहज गति ही सहज होना। जागृति नित्य समीचीन रहता ही है। यह परम्परा जागृत होने के उपरान्त ही सर्वसुलभ होता है। मानव परम्परा की जागृति का पहला स्वरूप शिक्षा संस्कार ही है। (म.वि, १३४ ) मानवापेक्षा, जीवनापेक्षा ही सार्वभौम अपेक्षा है। यही जागृति और कैवल्य का प्रमाण है। - आ.व. 257–259

(i) स्वास्थ्य संयम व्यवस्था में भागीदारी

शरीर स्वस्थता ही स्वास्थ्य का प्रमाण है। शरीर स्वस्थता का तात्पर्य जीवन अपने जागृति को शरीर के द्वारा प्रमाणित कर सके-यही स्वस्थ शरीर का मापदण्ड है जिसकी आवश्यकता एक स्वाभाविक अपेक्षा है। संयमता यही है अनुभव मूलक विधि से सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार का मानव परंपरा में प्रमाणित करना ही है। संयमता की महिमा व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होने और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित करना ही है। यही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में वैभवित होने का सूत्र है। इसी का व्याख्या सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज है।

स्वास्थ्य अर्थात् शरीर स्वस्थता को बनाये रखने के लिये आहार, विहारों में संतुलन आवश्यक रहता ही है। सप्त धातु संतुलन धर्मी अथवा सप्त धातु संतुलन कार्यकारी वस्तुओं को पहचानना, निर्वाह करना, उसके पहले जानना, मानना, अति आवश्यक रहता ही है। जीवन्त शरीर में शरीर जिसको हवा, पानी, अन्न, औषधि के रूप में ग्रहण करता है उसे पाचनपूर्वक अर्थात् योग, संयोग, संयोजन और शरीर कार्य विधि से रसों और धातुओं में विभाजित कर शरीर-सहज आवश्यकता के अनुसार परिवर्तीकरण अर्थात् रसमूलक विधि से धातुओं में परिवर्तीकरण सम्पन्न होता है। यही शरीर

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