अपने व्यवस्था के रूप में प्रमाणित करने का प्रयास जारी है। इन्हीं प्रयास क्रम में मानव परिवार मूलक स्वराज्य विधि से व्यवस्था में भागीदार होने का स्वरूप स्पष्ट हो गया है। अतएव प्रत्येक रचना और प्रत्येक जीवन अपने में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदार होने का तथ्य स्पष्ट होता है। यह सह-अस्तित्व विधि से ही सार्थक होता हुआ प्रमाणित है। मानव भी सह-अस्तित्व विधि से व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित कर सकता है। मानव ही जीवन जागृति के प्रमाणों को दृष्टा, कर्ता, भोक्ता विधियों से प्रमाणित करता है। - अ.श. 246–247
इस प्रकार समग्रता के साथ ही यह धरती, धरती की समग्रता के साथ ही मानव, मानव के समग्रता के साथ ही व्यवस्था और समाज परिकल्पना अध्ययन, योजना और क्रियान्वयन क्रम में मानवीयतापूर्ण मानव के वैभव की पहचान होती है। इसी विधि से मानव समाज और व्यवस्था का अविभाज्य स्वरूप को परिवार और परिवारमूलक व्यवस्था के रूप में देखा गया है। - अ.श. 239
5.9 परिवार में जीना, परिवार व्यवस्था में भागीदारी
मानव परम्परा में व्यवस्था सहज विधि से जीना ही जीने की कला को प्रमाणित कर पाता है। इस तथ्य को अच्छी तरह से देखा गया है। इसके साथ यह भी समीक्षित हुआ है कि व्यवस्था के पहले हम किसी भी प्रकार से जीने के जैसा नहीं दिखते हैं ये सब जीने के लिये प्रयत्नशील है। - आ.व. 257–258
व्यवस्था में जीना, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना एक आवश्यकीय कार्यकलाप रहते हुए व्यवस्था में जीने से सभी लोग संतुष्ट रहते हैं। इनमें से कुछ लोग परिवार प्रेरणा के आधार पर ही समग्र व्यवस्था में भागीदारी के लिए तत्पर हो जाते हैं। इस विधि से सम्पूर्ण परिवार ही कृत, कारित, अनुमोदित विधि से समग्र व्यवस्था में भागीदार होना प्रमाणित होता है। - स.श. 313
संतुलन का सहज रूप व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी ही है। इसके मूल में परस्पर पहचान और निर्वाह स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व की ही महिमा है। यही परस्परता, पहचान और निर्वाह का सूत्र है। इसकी व्याख्या हर अवस्था में हर इकाई करती ही रहती है। इसका नित्य प्रमाण सत्ता में संपृक्त प्रकृति सहज पहचान-निर्वाह, परमाणु अंशों के परस्परता में पहचान-निर्वाह, परस्पर परमाणुओं में पहचान-निर्वाह, परस्पर अणुओं में पहचान और निर्वाह, परस्पर रचनाओं में पहचान-निर्वाह, प्राणावस्था में बीजानुषंगीय विधि से पहचान-निर्वाह, जीव संसार में वंशानुषंगीय पहचान-निर्वाह करना स्पष्ट है। ज्ञानावस्था में मानव संस्कारानुषंगीय (जानने, मानने के आधार पर) सह-अस्तित्व रूप में परिवार व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में पहचान-निर्वाह दृष्टव्य है। - म.वि. 206-207
स्वराज्य व्यवस्था के प्रधान आयाम पांच हैं :-
(1) न्याय सुलभता (2) उत्पादन सुलभता (3) विनिमय सुलभता
(4) स्वास्थ्य संयम सुलभता (5) शिक्षा संस्कार सुलभता।