अखण्ड समाज विधि में होने वाले उत्सवों को संस्कारोत्सवों के रूप में पहचाना जाता है। इन सभी संस्कारों में जीवन जागृति ही परम लक्ष्य होना पाया जाता है। संस्कारों का अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन क्रम में ही उत्सवानुभूति होना, उसकी सार्थकता का होना देखा गया है। इस क्रम में जन्म संस्कारोत्सव, जन्मदिनोत्सव, नामकरणोत्सव, शिक्षा-संस्कारोत्सव (धर्म-कर्म, दीक्षा-व्यवहार, उत्पादन संस्कार) विवाहोत्सव मुख्य हैं। नैसर्गिक उत्सव ऋतुकाल के अनुसार मनाने की व्यवस्था है। क्योंकि सम्पूर्ण वनस्पति संसार भी ऋतुकाल के अनुसार उत्सवित होने के स्वरूप में देखा जाता है। यह सर्वविदित तथ्य है। इस विधि से समाज अपने अखण्डता के स्वरूप में ख्यात होना स्वाभाविक है। अखण्ड समाज अपने परिभाषा में पूर्णता के अर्थ में किया गया तन, मन, धन रूपी कार्यकलापों का निरन्तर गति अथवा अक्षुण्ण गति से है।
इस प्रकार परिभाषा के रूप में भी पूर्णता अपने-आप में इंगित होना पाया जाता है। पूर्णता का स्वरूप परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और स्वानुशासन के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था क्रम में व्यवस्था स्वयं क्रिया पूर्णता और उसकी निरन्तरता का द्योतक और प्रमाण है। स्वानुशासन जागृति पूर्णता का प्रमाण है। यही आचरण पूर्णता का स्वरूप है। पूर्णता के अनन्तर उसकी निरन्तरता का होना देखा गया है। क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता और उसकी निरंतरता सदा-सदा के लिये गतिशील रहना ही समाज गति का तात्पर्य है। ऐसी स्थिति मानव परंपरा में अस्तित्व सहज अनुभूति, अस्तित्व ही सह-अस्तित्व सहज होने के आधार पर विचार शैली, अस्तित्व में ही विकास और जागृति प्रमाणित होने के क्रम में मानव ही जागृति को प्रमाणित करना सम्पूर्ण अखण्डता का सूत्र है। ऐसे जागृति पूर्णता को परम्परा के रूप में प्रमाणित करने की विधि से व्यवस्था एक सहज क्रियाकलाप है। व्यवस्था सर्वमानव में स्वीकृत तथ्य है। फलस्वरूप सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज के आधार पर क्रियान्वित होना स्वाभाविक है। इस प्रकार मानव में क्रिया पूर्णता आचरण पूर्णता ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होता है। यह सर्वमानव में स्वीकृत अथवा स्वीकृत होने योग्य तथ्य है। इसका कारण जीवन महिमा ही है। जीवन सदा-सदा जागृति और जागृति पूर्णता के लिये उन्मुख रहता ही है। इसीलिये शैशव अवस्था से ही जागृति स्वीकृत होना रहता है और अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था भी स्वीकृत रहता है। इसकी आपूर्ति करना ही जागृत मानव परम्परा का प्रमाण है या तात्पर्य है। – स.श. 272–277
अलंकार, सत्कार, सम्मान, प्रतिज्ञा विधियों से सब अपने-अपने समुदायों की पहचान कर आधार बना चुकी हैं। ये सभी विधियां अपने को सार्वभौमता में प्रतिष्ठित करना भी चाहती हैं। सार्वभौमता का सूत्र मानवता ही है। इस कारण प्रत्येक समुदाय द्वारा मानवीय संस्कृति, सभ्यता, विधि व्यवस्था को पहचानना आवश्यक है। - ज.व. 272-274
व्यवस्था में न्याय सुरक्षा सुलभता, विनिमय कोष सुलभता, उत्पादन कार्य सुलभता, स्वास्थ्य संयम सुलभता और मानवीय शिक्षा संस्कार सुलभता का संयुक्त रूप है। इसी व्यवस्था में जीने की कला, सम्बन्धों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, व्यवस्था में भागीदारी का, संयुक्त रूप में प्रकाशित होना पाया जाता है। यह मानव संस्कृति का मध्य बिंदु है। मानव अपनी संस्कृति को व्यक्त करता है। उस समय आवास, अलंकार, उत्सव, सम्मिलित उत्सव, मानवीयता का प्रकाशन, प्रदर्शन और प्रचार, ये सब प्रधान रूप में रहना स्वाभाविक है।