मानव में मानवीयता ही नित्य उत्सव का आधार है। उत्सव, उत्साह, हर्ष, उल्लास, विश्वास के आधार पर सहज ही जीवन शक्तियों का प्रवाह है अथवा अभिव्यक्ति है। अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी, स्वयं उत्साह का साक्ष्य है। विश्वास (वर्तमान में स्वयं में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी) सहज सौजन्यता के संयोग में, नित्य उत्सव होना पाया जाता है। - म.वि. 138-140
जागृति सहज वैभव के अर्थ में सभी प्रकार से प्राप्त उत्साह सार्थक होना पाया जाता है। उत्सव सम्पन्नता ही संस्कृति का जागरण है। एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी के लिए प्रेरक प्रयोजनकारी होना ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वैभव और सार्थकता है।- डायरी 2008 fc/25
“सम्बन्ध के रूप में परिवार, निर्णय लेने के रूप में सभा है” – संवाद २०११
मानव परंपरा संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था के रूप में समीचीन है। संस्कृति क्रम में शिक्षा- संस्कार ही प्रधान मुद्दा है और सभ्यता में इसी शिक्षा-संस्कार का प्रमाणपूर्वक पोषण विधि प्रमाणित होती है; यह एक आचरण का ही स्वरूप है। - स.श. 239
संस्कृति के साथ सभ्यता का पहचान हर समुदाय स्वीकारा है। सभ्यता विशेषकर आगन्तुक व्यक्ति के साथ किया गया संबोधन परस्पर परिचय क्रम, परस्परता में घटित घटना, हाट (बाजार), सभा, सम्मेलनों में राजधर्म, संबंधों में आशय, मार्गदर्शन, निर्देशन का अनुसरण सभ्यता के मूल में स्पष्ट है। -स.श. 14
शिष्टता और सुशीलता ये अपेक्षाएँ सर्वमानव में विद्यमान हैं। शिष्टता का परिभाषा मानव अपने मानवत्व सहित व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने में विश्वास और उसकी अभिव्यक्ति है। सुशीलता का तात्पर्य मूल्य, चरित्र, नैतिकता का अविभाज्य रूप में सभी स्थिति - गतियों में व्यक्त होना ही है। ऐसी शिष्टता हर मनुष्य में, हर मनुष्य से, हर मनुष्य के लिये अपेक्षित रहना पाया जाता है। ऐसी शिष्टता ही सभ्यता का सूत्र है और संस्कृति सहज गति है। इस प्रकार सभ्यता हर स्थितियों में मूल्यांकित होता है और संस्कृति हर गतियों में चिन्हित और मूल्यांकित होता है। इसी महिमावश अथवा फलवश हर मानव, मानव का परिभाषा सहज विधि से सोचने, सोचवाने, बोलने, बोलवाने और करने-कराने योग्य स्वरूप में प्रमाणित हो जाता है। यह शिष्टता, सुशीलता और परिभाषा एक दूसरे के पूरक होना पाया जाता है। यही समाज गति है। समाज गति का ही दूसरा नाम सार्वभौम व्यवस्था है। इस प्रकार परिवार क्रम में शिष्टता, सुशीलता और परिवार व्यवस्था क्रम में मानव का परिभाषा प्रमाणित होता ही रहता है। इससे यह पूर्णतया स्पष्ट होती है। व्यवस्था क्रम और परिवार क्रम यह अविभाज्य वर्तमान है। -स.श. 225
शिक्षा-संस्कार से प्राप्त स्वीकृतियों, अवधारणाओं, अनुभवों, विचार शैली सहित सर्वतोमुखी समाधान मानसिकता से सम्पन्न होना ही मानवीय संस्कार सफलता का प्रमाण है। यही सभ्यता का आधार है। मानवीयतापूर्ण सभ्यता स्वाभाविक रूप में न्यूनतम परिवार सभा से विश्व परिवार सभा सहज भागीदारियों को निर्वाह कर लेना ही है। अर्थात्