राज्यनीतिक व्यवस्था = विधि + व्यवस्था
- राज्य के दो पक्ष सिद्ध हैं – विधि और व्यवस्था।
- विधि: एक या अनेक व्यक्तियों द्वारा सामाजिकता को अक्षुण्ण रखने के उद्देश्य से व्यवस्था प्रदान करने हेतु निर्णित नियमपूर्ण पद्धतियों की विधि संज्ञा है (* = मानवीयतापूर्ण आचार संहिता)
- व्यवस्था – विधि के आशय को कार्यरूप प्रदान करने हेतु प्रस्तुत परम्परा की व्यवस्था संज्ञा है
व्यवस्था का प्रत्यक्ष रूप में से उत्पादन एवं उसके सहायक तत्वों को सर्वसुलभ बनाना है।
विधि का शुद्घ रूप ही सामाजिक मूल्यों यथा जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य व शिष्ट मूल्य का संरक्षण एवं संवर्धन है। - अ.द. 65–67
विधि का अर्थ है मानव में निहित अमानवीयता का शमन तथा व्यवस्था का तात्पर्य है मानवीयता की स्थापना के लिये प्रोत्साहन योग्य अवसर व साधन को उपलब्ध कराने की सामर्थ्य अर्जित करना:-
- राज्य के लिए आवश्यकीय व्यवहार, व्यवस्था, व्यवसाय, शिक्षा, प्रचार, व प्रदर्शन ही विधि है तथा विपरीत में निषेध है। विधि व निषेध का निर्णय उनके आर्थिक और सामाजिक अनुकूलता तथा प्रतिकूलता पर आधारित होने के कारण ही आज जिसे आर्थिक व सामाजिक परिस्थितिवश विधि मान लिया गया है अथवा हठ या बलपूर्वक मनवा लिया गया है, उसके कालान्तर में परिवर्तित होने पर जो होता है, वह निषेध हो जाता है। इस प्रकार विधि व निषेध के सम्बन्ध में अनिश्चितता के कारण अनिश्चित अवधि के लिये समस्या बनी ही रहती है। - व्य.द. 1978, 170
- कोई भी मनुष्य अनिश्चित विधि व व्यवस्था नहीं चाहता। विधि एवम् व्यवस्था के प्रति विश्वास एवम् निष्ठा के निरन्तरता के लिये भी उसकी स्थिरता आवश्यक है।
- इसके पूर्व में न्यायवादी व अवसरवादी व्यवहार का विश्लेषण किया जा चुका है। अवसरवादी-नीति से अनिश्चित दिशा, गति एवम् उपलब्धि ही सम्भव है, जिससे व्यवस्था में स्थिरता तथा विश्वास नहीं उत्पन्न कराया जा सकता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि न्यायवादी नीति के विकास तथा व्यवहारान्वयन के लिए मानवीयता ही आधार है। - व्य.द. 1978, अध्याय 16
- विधि का लक्ष्य है, निषेध पर विजय (समाधान) और व्यवस्था का लक्ष्य है विधि का संरक्षण एवं संवर्धन। उपरोक्तानुसार निर्णीत विधि से अमानवीयता का शमन होता है तथा ऐसी विधि के लिए दी गई व्यवस्था का लक्ष्य