मानवीयता का संरक्षण एवं संवर्धन ही है. इस प्रकार विकसित विधि व व्यवस्था की उपलब्धि विश्वास है। व्य.द. 1978,अध्याय 16

  • विधि एवम् व्यवस्था न्याय के पक्षपाती बन कर विश्वास पैदा करते हैं। निषेध भय उत्पन्न करता है। विधि के अनुरूप व्यवस्था पक्ष, मानवीयतापूर्ण व्यवसाय, शिक्षा, उत्पादन, उपभोग व वितरण के कार्यकलाप से मार्गदर्शन करता है, सुगमता प्रदान करता है, फलस्वरूप व्यवसाय में विश्वास उत्पन्न करता है।
  • ऐसे राज्य व विधि और व्यवस्था की अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए शिक्षा, व्यवसाय, व्यवसाय, राजस्व, वित्त तथा सुरक्षा, इन छ: प्रधान पक्षों का अध्ययन आवश्यक है। इन सबमें शिक्षा अति महत्वपूर्ण है। शिक्षा नीति की अपूर्णता बाकी सभी पक्षों को प्रभावित करती है।
  • विधि का मूल सूत्र मानवीयता पूर्ण आचरण ही है
  • मानव परंपरा में समझदार मानव ही शिक्षा प्रदान करने में समर्थ है। शिक्षा का प्रयोजन है, अखंड-सामाजिकता का सूत्र एवं व्याख्या समाधान, समृद्धि, अभय व सह-अस्तित्व। इस विधि से समाज अखंडता और सार्वभौमता के रूप में वैभवित होता है।

विधि सहज नीति

  • राष्ट्रीय स्तर पर राज्य-नीति निम्न छ: दृष्टिकोण से निर्धारित की जानी चाहिए तथा उसका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। इन बिन्दुओं के आधार पर मानव के सह-अस्तित्व, विकास तथा समृद्धि की दृष्टि से राज्य-व्यवस्था तथा अनुशासन का सामान्यीकरण महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।
  • १. राष्ट्रीय सुरक्षा,
  • २. आर्थिक सुरक्षा,
  • ३. व्यावसायिक सुरक्षा,
  • ४. विनिमय सुरक्षा,
  • ५. विद्याध्ययन सुरक्षा, और
  • ६. नैतिक सुरक्षा

१. राष्ट्रीय सुरक्षा

राष्ट्रीय जन-जाति में राष्ट्रीय स्वत्व की धारणा एवम् निष्ठा को सुरक्षित रखने की दृष्टि से सीमावर्ती सुरक्षा अति आवश्यक है, जिससे दूसरा राष्ट्र आतंक न उत्पन्न कर सके।

  • इसके लिये राष्ट्रीय सुरक्षात्मक नीति का निर्धारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को ध्यान में रख कर करना चाहिये, जिससे संबंधित राष्ट्रांतर्गत व्यक्ति, परिवार तथा समाज को सुरक्षा का अनुभव हो सके और प्रत्येक व्यक्ति भय
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