- से रहित होकर व्यवसाय में रत हो सके, जिससे समृद्धि-पूर्ण जीवन का अनुभव कर सकने का अवसर उपलब्ध हो।
- स्पष्ट है कि ऐसी नीति मात्र मानवीय दृष्टि को लक्ष्य में रखकर ही निर्धारित की जा सकती है, साथ ही ऐसी नीति में अन्य राष्ट्रों के शोषण की कोई संभावना न होने से परस्पर सह-अस्तित्व के लिये विश्वास के आधार का निर्माण होगा।
२. आर्थिक–सुरक्षा
राष्ट्रीय अर्थ सुरक्षा का नीति निर्धारण निम्न बिन्दुओं के आधार पर किया जाना चाहिये –
राज्य-व्यवस्था द्वारा सभी व्यक्तियों को उनकी क्षमता, पात्रता, एवम् योग्यता के आधार पर कार्य में रत करने वाली नीति का विकास।
- अधिकाधिक उत्पादन के लिये प्रोत्साहन देना तथा तदनुरूप साधन एकत्र करना।
- अधिकतम या न्यूनतम आय को निकटतम करने की नीति का विकास करना।
- क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के आधार पर गौरव प्रदान करना।
- उत्पादन हेतु अधिकतम धन व्यय करने हेतु प्रोत्साहन देने वाली नीति का विकास करना।
- अनेक जाति, वर्ग, मत एवम् पक्षात्मक विचारों से मुक्त नीति का विकास करना।
- परधन, परनारी/परपुरुष व पर-पीड़ात्मक वृत्तियों का उन्मूलन करने वाली नीति का विकास करना - स्वधन, स्वनारी/स्व पुरुष, दया पूर्ण कार्य-व्यवहार को स्थापित करने वाली नीति का विकास करना।
- शोषणात्मक प्रवृत्तियों का दमन करने वाली नीति का विकास करना।
- शासन (*व्यवस्था) के अंतर्गत सभी व्यक्तियों अथवा नागरिकों को एक सा न्याय दिलाने वाली पद्धति का विकास करना।
- समस्त अर्थ नीति द्वारा मानवीयता-पूर्ण दृष्टि, स्वभाव व विषय को लक्ष्य में रखते हुए समस्त संपर्क तथा संबंधो का निर्वाह करने में व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक को समृद्ध होने की पूर्ण संभावना होनी चाहिये, जिसका मूर्त रूप स्वधन, स्व-नारी/स्व-पुरुष एवम् दया पूर्ण क्रियाओं में निष्ठा एवम् परधन, परनारी/परपुरुष एवं पर-पीड़ात्मक क्रियाओं का दमन ही है, क्योंकि अंततोगत्वा समस्त संपर्क एवम् संबंध और संपत्ति का साकार व्यवहार रूप स्वधन, स्व-नारी/स्व-पुरुष और दया युक्त व्यवहार की उपलब्धि ही है।
३. व्यावसायिक सुरक्षा
प्रत्येक व्यक्ति के श्रम और तकनीक का पूर्ण सदुपयोग करते हुये अर्थ के उत्पादन की दिशा में किये गये प्रयास की ‘व्यवसाय’ संज्ञा है।