प्राप्त श्रम एवम् तकनीक का सदुपयोग ही अर्थ-सुरक्षा है।
- मानव के लिये आवश्यकीय व्यवसाय मुख्यत: दो ही हैं – १. कृषि और २. उद्योग। अन्य जितने भी व्यवसाय हैं, वह इनके आश्रय में तथा इनके पूरक सिद्ध होते हैं।
- व्यवसाय की सुरक्षा के लिये *राष्ट्र व्यवस्था (शासन) की निम्न तथ्यों के आधार पर नीति निर्धारण करना चाहिये।
- १. निपुणता एवम् कुशलता को वरीयता प्रदान करना,
- २. निपुण एवम् कुशल व्यक्ति को साधन उपलब्ध कराना,
- ३. मनुष्योपयोगी वस्तुओं, यथा आहार, आवास, अलंकार, दूरगमन, दूर-श्रवण तथा दूर-दर्शन के लिये वस्तुओं तथा उपकरणों पर प्रयोग तथा प्रयास को सहायता देने वाली नीति का विकास करना;
- ४. अधिकाधिक उत्पादन करने वाली, निपुणता तथा कुशलता का सामान्यीकरण करने वाली नीति का विकास करना,
- ५. श्रम के फल का शोषण न हो, ऐसी नीति का विकास करना ,
- ६. व्यवसाय में जो बाधा उत्पन्न करते हों, उनको *सुधार करने वाली नीति का विकास करना,
- व्यवसाय की सुरक्षा के लिये नीति निर्धारण करते समय न्याय के आश्रय से या न्यायोचित व्यावसायिक नीति का विकास करने से ही संपर्क एवम् संबंधों के निर्वाह हेतु उपयुक्त उपयोग, उपभोग, वितरण, प्रयोग व व्यवसाय के लिये समुचित अवसर उपलब्ध हो सकेगा।
४. विनिमय सुरक्षा
उत्पादित वस्तुओं को (*श्रम विनिमय) सहित दूसरों को प्राप्त कराने वाले प्रयास की ‘विनिमय’ संज्ञा है।
*विनिमय (वाणिज्य)-सुरक्षा के लिये निम्न आधार पर नीति निर्धारण होना चाहिए।
१- व्यावसायिक लाभ के वितरण हेतु सहअस्तित्ववादी दृष्टि व व्यावसायिक पद्धति को प्रोत्साहित करने वाली नीति का निर्धारण करना।
- २- श्रम के फल पर ही निर्भर रहने वाली व्यावसायिक पद्धति का विकास अर्थात् व्यापार में ब्याज द्वारा आय पद्धति का उन्मूलन करने की नीति का विकास करना।
- वाणिज्य अन्तर्राष्ट्रीय एवम् राष्ट्रीय इन दो भेदों से संपन्न होता है।
- अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्य शोषण अथवा आदान प्रदान (लाभ हानि रहित) के लक्ष्य भेद से सम्पन्न होता है, जो वस्तु व मुद्रा के माध्यम से होता है।
- अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्य, आदान प्रदान की नीति अपनाने से सफल होता है, क्योंकि यह प्रणाली शोषण मुक्त होने के कारण सह-अस्तित्व की भावना स्थापित करती है और आपसी सद्भाव व