- वर्तमान शिक्षा नीति के समक्ष ऐसी कोई स्पष्ट रूप-रेखा नहीं है अथवा स्पष्ट लक्ष्य नहीं है, जिसके परिप्रेक्ष्य में इसकी उपादेयता का निर्णय किया जा सके। उपरोक्तानुसार लक्ष्य निर्धारण से ही पूरी शिक्षा-प्रणाली की एक दिशा निर्धारित हो जाती है।
- वर्तमान शिक्षा पद्धति के अवलोकन से, वर्तमान शिक्षा-पद्धति में यह पाया जाता है कि किसी भी विषय का ज्ञान पूर्णत: विद्यार्थियों को नहीं होता। जिन विषयों का शिक्षण न होने से यह अध्ययन अपूर्ण रह जाता है उसे नीचे दर्शाया गया है : -
- १. विज्ञान के साथ चैतन्य पक्ष का अध्ययन।
- २. मनोविज्ञान के साथ संस्कार पक्ष का अध्ययन।
- ३. अर्थशास्त्र के साथ प्राकृतिक एवम् वैकृतिक ऐश्वर्य के सदुपयोगात्मक तथा सुरक्षात्मक नीति-पक्ष का अध्ययन।
- ४. समाज-शास्त्र के साथ मानवीय संस्कृति तथा सभ्यता का अध्ययन।
- ५. राजनीति शास्त्र के साथ मानवीयता के संरक्षण एवम् संवर्धन के नीति-पक्ष का अध्ययन।
- ६. दर्शन शास्त्र के साथ क्रिया पक्ष का अध्ययन।
- ७. इतिहास एवम् भूगोल के साथ मानव तथा मानवीयता का अध्ययन।
- ८. साहित्य-शास्त्र के साथ तात्विकता का अध्ययन।
उपरिवर्णित बिन्दुओं के साथ जितने भी पूरक तथ्यों को निर्देशित किया गया है, उन सबको एक समुच्चयात्मक पाठ्यक्रम नीति के रूप में विकसित करना चाहिये तथा सुलभ बनाना चाहिये। तभी सब विषयों के अध्ययन के अनन्तर, ‘जो व्यवहार में चरितार्थ होना है’ अर्थात् विद्वानों द्वारा चिराकांक्षित मानवीयता की अभिव्यक्तियाँ सुलभ सबल होकर निरंतरता को प्राप्त कर सकेंगी। फलस्वरूप समाज में सामाजिकता से प्राप्त होने वाली स्वर्गियता का अनुभव सर्वसुलभ एवम् सामान्य हो सकेगा। -व्य.द. 1978, 173-180
(1) मानवीय व्यवस्था स्वरूप
मानवीय व्यवस्था के सार्वभौम स्वरूप को पांच आयाम एवं दश सोपान में पहचाना गया है।
यथा:
- शिक्षा-संस्कार व्यवस्था
- स्वास्थ्य-संयम व्यवस्था
- उत्पादन कार्य व्यवस्था
- विनिमय-कोष व्यवस्था
न्याय-सुरक्षा व्यवस्था