- विश्वास की स्थापना करती है। यह प्रणाली एक दूसरे को समृद्ध बनाने तथा विकास की ओर उन्मुख करने में सहायक होती है।
- राष्ट्रीय वाणिज्य, लाभ-संग्रह व लाभ-वितरण के आशय-भेद से सम्पन्न होता है। उत्पादन एवम् उपभोक्ता के बीच में स्थित इकाई संग्रहवादी विचार से शोषण करती है, जिससे आर्थिक विषमता तथा असंतुलन उत्पन्न होकर सामाजिक विषमता का प्रादुर्भाव होता है। यह विषमता असंतोष को जन्म देती है, जो अंततोगत्वा ‘क्रान्ति’ में परिणित होता है। राज्य-व्यवस्था का यह दायित्व है कि ऐसी नीति का विकास करे कि शोषण की संभावना ही समाप्त हो जाय। अत: अन्तर्राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रीय वाणिज्य भी न्यायाश्रित होना चाहिए। न्यायाश्रित वाणिज्य (विनिमय) ही परस्पर पोषक होगा अन्यथा शोषण है ही।
५. विद्याध्ययन सुरक्षा
विधिवत वस्तुस्थिति का परिचय कराने वाली जानकारी की ‘विद्या’ संज्ञा है। चेतनायुक्त स्मरण सहित विधिवत जानकारी के लिये किए गए प्रयास की ‘अध्ययन’ संज्ञा है।
ऐसी जानकारी की आवश्यकता मनुष्य को इसलिए है कि वह भौतिक समृद्धि तथा बौद्धिक समाधान से सुखानुभव करना चाहता है।
- अध्ययन को सफल बनाने का दायित्व अध्यापक, अध्यापन तथा शिक्षा प्रणाली पर है, क्योंकि यह चारों परस्पर पूरक हैं। फिर भी शिक्षा प्रणाली का इसमें बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
- अध्ययन का दायित्व विद्यार्थी की क्षमता पर है। शिक्षा प्रणाली, अध्यापक, माता, पिता तथा अध्ययन यह सब एकसूत्रात्मक होने से ही सफल विद्याध्ययन पद्धति का विकास संभव है, जिससे कृतज्ञता तथा सह-अस्तित्व का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा तथा शासन व प्रजा दोनों शोषण से मुक्त हो सकेंगे।
- उपरोक्तानुसार शिक्षा प्रणाली के लिये शिक्षा नीति के निर्धारण के लिये धर्म-नीति और राज्य-नीति का निर्भ्रम ज्ञान आवश्यक है।
- शिक्षा नीति का आधार मानवीयता तथा सामाजिकता होनी चाहिये। मानवीयता तथा सामाजिकता एकदेशीय तथ्य न होकर सार्वभौमिक तथ्य है। इसलिये उनको आधार मानकर विकसित शिक्षा प्रणाली से ऐसे व्यक्तित्व-संपन्न नागरिकों का निर्माण होगा, जिनकी सहअस्तित्व तथा पोषण में दृढ़ निष्ठा होगी।
- शिक्षा नीति का लक्ष्य है –
‘मानवीय दृष्टि, गुण व विषय सम्पन्न नागरिकों का निर्माण, जिनमें अतिमानवीयता के लिये जिज्ञासा हो।’