यह ‘परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था’ विधि से एक-स्तरीय परिवार-व्यवस्था अन्यों के साथ ‘प्रतिनिधि विधि’ से भागीदारी करते हुए, १० सीढ़ियों में ‘विश्व परिवार व्यवस्था’ तक समझा गया है।यही सार्वभौम व्यवस्था का स्वरूप है ।

(*इस ढंग से) राज्य का स्वरूप अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र अध्ययन से और आचरण से व्याख्या होने के आधार पर विधि को पहचानने के मुख्य रूप से पाँच मुद्दे पाए गए हैं ।

पांच आयामी कार्यक्रम

राज्य प्रक्रिया में उक्त पाँचों व्यवस्थाएं सार्वभौमिकता के अर्थ में ही सार्थक होना पाया जाता है ।

  • मानवीय शिक्षा-संस्कार की सफलता अर्थ-बोध होने के रूप में है।
  • न्याय-सुरक्षा की सफलता संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन पूर्वक उभय-तृप्ति के रूप में सार्थक होना पाया जाता है।
  • उत्पादन-कार्य हर परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन के रूप में, समृद्धि के अर्थ में सार्थक होना पाया जाता है
  • विनिमय-कोष श्रम-मूल्य के पहचान सहित, श्रम विनिमय पद्दति से सार्थक होता है।
  • और स्वास्थ्य-संयम मानव-परंपरा में जीवन जागृति को प्रमाणित करने योग्य शरीर की स्थिति-गति के रूप में सार्थक होता है।

यह सब मानव सहज जागृति के अक्षुण्णता का द्योतक है अथवा सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज और उसकी अक्षुण्णता का द्योतक है ।यही राज्य वैभव का स्वरूप है।इस विधि से हर परिवार समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना होता है ।

दश सोपानीय व्यवस्था

कोई भी मानव अनिश्चित विधि व व्यवस्था नहीं चाहता। विधि एवं व्यवस्था के प्रति विश्वास एवं निष्ठा की निरंतरता के लिए सार्वभौम विधि-व्यवस्था आवश्यक है ।

समूचे व्यवस्था का अर्थात् एक परिवार से विश्व परिवार, मानव व्यवस्था को पहचानने-निर्वाह करने के क्रम में दस सीढ़ियों में पहचानना सहज है। यथा

(1) परिवार सभा व्यवस्था

(2) परिवार समूह सभा व्यवस्था

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