मानव और नैसर्गिकता में पूरकता ही आगे और उसके आगे आने वाली पीढ़ी में व्यवस्था में जीने की आवश्यकता, सम्भावना और प्रयोजनों को हृदयंगम करने की परम आवश्यकता है। नियति सहज संतुलन को बनाए रखना ही वर्तमान में विश्वास,दूसरी भाषा में सह-अस्तित्व, अभय, समृद्घि और समाधान है। यह सर्वमानव की वांछा भी है।
सर्वेक्षण से पता लगता है यह सर्वमानव का सर्वकालिक वांछा है। इसके आधार पर मानव अपने नियति सहज कार्यक्रमों को पहचान पाता है जब जागृत परंपरा इस धरती पर सर्वसुलभ हो जाए।
जागृत मानव ही उभय प्रकार के संतुलन के लिए दायी होता है और सटीकता से निर्वाह भी होता है। ऐसी ऐश्वर्यमयी अभ्युदय रूपी नित्य वर्तमान में, से, के लिये मानवीय पूर्ण संविधान अध्ययन और आचरण का वस्तु है।
नित्य शुभ और नित्य शुभ संभावना सर्वमानव में, से, के लिये नित्य समीचीन एवं समान है।
यह मानवीय आचरण रूपी संविधान जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन सम्मत विधि से पाये गये हैं। मानव अस्तित्व में अविभाज्य है। प्रत्येक मानव जीवन और शरीर का संयुक्त रूप है। तृप्तियाँ जीवन से संबंधित और मानव तृप्ति वर्तमान में विश्वास होने के आधार पर प्रमाणित होता है। यह प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता और अपेक्षा है। वर्तमान में विश्वास सम्पन्न होने के लिए सह-अस्तित्व, समृद्घि और समाधान साक्षित होना पाया जाता है। यह धरती स्वस्थ रहने की स्थिति में और मानव परंपरा जागृत रहने की स्थिति में ऐसा सर्वशुभ हर व्यक्ति में, से, के लिये सफल होना सहज है।
- सर्वमानव सार्वभौम शुभ को चाहते हैं।
- चाहने-होने के मध्य में मानव मानवीयतापूर्ण विधि से आचरण करना ही एकमात्र विधि है। यही संविधान है।
- अन्य सभी अवस्थाओं में भी उन-उनके आचरणों से ही उन-उन अवस्थाओं की मौलिकता प्रमाणित होती है। इस विधि से भी आचरण ही मौलिकता का प्रमाण है।
- सह-अस्तित्व में ही मौलिक आचरण, सह-अस्तित्व में ही मानव में जागृति प्रमाणित होना पाया जाता है।
- सह-अस्तित्व में ही मानव स्वयंस्फूर्त विधि से सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार को विचार सम्मत, सम्पूर्ण विचारों को अनुभव सम्मत और सम्पूर्ण अनुभवों को सह-अस्तित्व सम्मत विधियों से प्रमाणित करना ही मौलिक अधिकारों सहज प्रतिष्ठा, वर्चस्व, आवश्यकता एवं समाधान है। - आ.व. 140 -142
(C) स्वत्व-स्वतंत्रता-स्वराज्य
समाधानित मानव में, से, के लिए कृत कारित , अनुमोदित विधि से किया गया सम्पूर्ण क्रियाकलाप स्वतंत्रता है। उसके परिणामों की पहचान ही स्वराज्य है। स्वयं का वैभव अर्थात् मानवकुल का वैभव स्वयं में स्वराज्य है। - ज.व. 93-94