इसी आधार पर हम विश्वास करते हैं कि समझदारी का लोकव्यापीकरण होना स्वाभाविक है। समझदारी ही मानव परिभाषा के अनुसार प्रमाण हो पाता है अन्यथा हम परिभाषा के अनुरूप प्रस्तुत नहीं हो पाते।

मानवीयता पूर्ण आचरण को सहअस्तित्व रूपी दर्शन के आधार पर जीवन ज्ञान के आधार पर पहचाना गया है। मानवीयतापूर्ण आचरण का पहला आयाम संबंधो को पहचानना, मूल्यों का निर्वाह करना, मूल्यांकन करना, परस्परता में तृप्ति को पाना। दूसरा आयाम में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष, दयापूर्ण कार्य करना। तीसरे आयाम में तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा करना। तन, मन, धन रूपी अर्थ के सदुपयोग का तात्पर्य परिवारगत आवश्यकता के अनुसार शरीर पोषण संरक्षण और समाजगति में नियोजित करना। मानव समाज अखंड समाज ही होता है। -ज.व. 93,94

(B) मानवीय संविधान का स्वरूप

अनुभव प्रमाण परंपरा में मानव ही मानव के लिये प्रेरक, कारक होने की विधि से लोकव्यापीकरण करता है।

जागृति के अनन्तर मानव परंपरा में, से, के लिए प्रयोजन सर्वशुभ चाहने वाले मानव सहज और जागृत जीवन सहज विधि से प्रमाण रूप में सार्थक होना देखा गया। मानव सहज विधि से समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व, स्वायत्त मानव, परिवार मानव, व्यवस्था मानव और समाज मानव प्रमाणित करता है। इसमें सर्व मानव का स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार होना देखा गया है इसीलिये इसका लोक व्यापीकरण समीचीन हो गया है। जीवन सहज प्रयोजन, जागृति और जागृतिपूर्णता ही है। जागृतिपूर्णता, उसकी निरन्तरता क्रम में सुख, शांति, संतोष, आनन्द अक्षुण्ण होना पाया जाता है। यह जागृतिपूर्ण मानव (दिव्यमानव) में, से, के लिए प्रमाण और प्रामाणिकता पूर्वक वैभवित होना स्वाभाविक है। यही स्वानुशासन और परम स्वतंत्रता है। यही गति का गंतव्य स्वरूप है। यह प्रमाणित होना नियति सहज विधि है। ऐसे प्रमाण मानव परंपरा में सार्थक होना देखा गया है इसलिये और प्रकार की शरीर रचना को प्रतीक्षित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मानव परंपरा में इस दशक में जितने भी नस्ल हैं उन सभी नस्लों में रचना का प्रधान भाग मेधस होना और वह पूर्णतया समृद्घ होना देखा गया है। अब केवल जागृतिपूर्ण परंपरा की ही आवश्यकता है। यह अनुभवमूलक प्रमाणों को लोकव्यापीकरण विधि से सार्थक होना स्वाभाविक है। यही भ्रम और बंधन मुक्ति का प्रयोजन मानव परंपरा में सुलभ होती है।

जागृतिपूर्ण परंपरा में ही सर्वमानव व्यवस्था में जीना, समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करना स्वाभाविक है, अनिवार्य है और आवश्यक है। व्यवस्था में जीने देकर जीना परिवार में ही प्रमाणित होता है। इसके मूल में मानव में स्वायत्तता अति अनिवार्य स्थिति है। व्यवस्था में जीने का फलन ही समाधान, समृद्घि का प्रमाण और अभय, सह-अस्तित्व का सूत्र होना देखा गया है। स्वायत्त मानव का स्वरूप पहले स्पष्ट किया जा चुका है। ऐसे स्वायत्त मानव से जागृतिपूर्ण शिक्षा प्रणाली, पद्घत्ति, नीतिपूर्वक सर्वसुलभ हो जाती है। यही भ्रम (बन्धन) मुक्त मानव परंपरा का सूत्र है। इसके क्रियान्वयन क्रम में परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, ग्राम परिवार और विश्व परिवार के रूप में गठित होने, साकार होने और क्रियारत होने की पूर्ण संभावना, आवश्यकता का संयोग होता है।

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