(A) मानवीय संविधान की आवश्यकता
मानव कुल समझदारी के आधार पर ही संयुक्त वैभव को प्रमाणित कर पाता है न कि युद्घ, शोषण, द्रोह, विद्रोह से। संग्रह सुविधा के सर्वाधिकता के जगह में भी हजारों लाखों लोग इस धरती पर हो चुके हैं। इसके बावजूद पद, पैसा, प्रतिष्ठा सम्पन्न होते हुए उनके स्वयं में तृप्ति का न होना पाया जा रहा है। इस स्थिति में पद, पैसा, प्रतिष्ठा के आधार पर राज्य गद्दी क्या सफल हो पायेगी ? क्या स्वराज्य मिलेगा ? क्या मानव स्वतंत्र हो पायेगा ? ऐसा हम सोचने विचारने जाते हैं तब इससे नहीं होगा, यही आवाज निकलती है। इसी मुद्दे पर विचार की आवश्यकता इस व्यवहारात्मक जनवाद के माध्यम से प्रस्तुत करने में प्रयत्न शील है।
एक ज्वलंत प्रश्न है किताब प्रमाण होगा, यंत्र प्रमाण होगा या मानव प्रमाण होगा ? यदि मानव ही प्रमाण होगा तब हम आगे समझ बूझ तैयार करेंगे यह मानव स्वीकृति के आधार पर निर्भर है। यंत्र और किताब के प्रमाण के आधार पर मानव कुल अभी तक स्वराज्य और स्वतंत्रता का इन्तजार करता ही आया है। अपनी अपनी संस्कृति, सभ्यता , धर्म, पूजा पाठ में स्वतंत्रता संविधानों में उल्लेखित है। इस प्रकार की स्वतंत्रता में न तो सार्वभौमता हुई न सार्वभौमता का रास्ता मिल पाया। यंत्रो के आधार पर जो स्वतंत्रता है वह स्वतंत्रता के लिए मूल वस्तु धन होना पाया गया इसलिए मानव धन संग्रह में ज्यादा से ज्यादा अपनी मानसिकता और श्रम को नियोजित किया। हर समुदायों की अपनी अपनी पूजा स्थली होती है जो निर्माण शिल्प विधाओं से बनी रहती है। इसमें पूजा करने वाले या ऐसे स्मारको में पूजा प्रार्थना करने वाले सब समुदाय अपने को अलग अलग मान लेते हैं। जबकि ये सब मानव ही रहते हैं। यही मूलत: स्वयं में अविश्वास का आधार रहा है। क्योंकि स्वयं का स्वरूप मानव ही होता है और कुछ भी नहीं होता है। हर समुदाय में प्रतिबद्घ मानव अन्य समुदायों से भिन्न मानना एक आदत बनी रहती है। आदतन अपने को जब मानव गिरफ्त कर लेता है अन्धकूप में हो जाता है। गिरफ्त होने का मतलब जो सर्व स्वीकृति की वस्तु न हो, ऐसी वस्तु (स्वयं स्वीकृति) में प्रतिबद्घता आ जाये, कट्टरता आ जाये, बर्बरता आ जाये, यही गिरफ्त होने का प्रमाण है। हर समुदाय या कोई भी समुदाय इस प्रकार की गिरफ्त में न तो स्वराज्य पाता है न स्वतंत्रता को पाता है, न व्यवस्था को पाता है। परिणाम स्वरूप व्यवहार मानव हो ही नहीं सकता।
हम मानव अपने में देख रहे हैं हर समुदाय में अन्तर्विरोध और परस्पर समुदायों में विरोध है। विरोध समाज का सूत्र नहीं है व्याख्या नहीं है। इसी लिए समुदाय संविधान सार्वभौम होना संभव नहीं हुआ इसलिए मानवीय संविधान को पहचानने की आवश्यकता आ चुकी है। इस पर परामर्श आवश्यक है। मानवीय आचार संहिता रूपी संविधान मानव के पहचान के आधार पर ही आधारित रहेगा। मानव की पहचान अपने में परिभाषा, आचरण व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी का संयुक्त वृत में स्वीकार होती है। मानव की परिभाषा मनाकार को साकार करने वाला मन:स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला है। मनाकार को मानव आहार, आवास, अलंकार, दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया है। जहां तक मन: स्वस्थता को प्रमाणित करने की बात आती है इस मुद्दे पर सोच विचार तैयार नहीं हुए, चाहत सभी में है। इसके लिए सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व को समझने समझाने का, जीवन ज्ञान को समझने समझाने का, मानवीयता पूर्ण आचरण को समझने समझाने का अधिकार अर्हता सहित पारंगत होने के आधार पर इस परिभाषा को मानव के सम्मुख रखा गया है। समझदारी में पारंगत होने के उपरान्त ही मानव की परिभाषा स्वाभाविक रूप में स्पष्ट हो गई।