जागृतिपूर्ण सभी मानव संविधान के धारक वाहक हैं। प्रत्येक मानव जागृति में, से, के लिये मानव पंरपरा के रूप में प्रस्तुत हैं। इसीलिये जागृत हैं या जागृत होने योग्य हैं। प्रत्येक जागृत मानव मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक स्वतंत्रता और स्वराज्य का धारक-वाहक और प्रेरक है। इसलिये प्रत्येक मानव शिक्षा-संस्कारपूर्वक जागृत होता है।
‘मानवत्व’:-
ही मानव परम्परा में स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकार के रूप में नित्य प्रमाणित है। ‘मानवत्व’ प्रत्येक स्त्री, पुरूष में समान होता है।
- <strong>स्वत्व</strong>: = समझदारी, ज्ञान –डायरी, २०००/ 265
जागृति ही मानव का ‘स्वत्व’ है। सम्पूर्ण अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण में परिपूर्णता ही जागृति है। जागृति सहज स्थिति सुख, शांति, संतोष और आनंद की सहज निरंतरता है। जागृति सहज गति समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व ही है। स्थिति और गति अविभाज्य है। - स.श. 131
- <strong>स्वतंत्रता</strong>: = लक्ष्य व दिशा निर्धारण –डायरी, २०००/ 265
सृष्टि, जड़ एवं चैतन्य दो अवस्थाओं में है। जड़ अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था के रूप में है। जिसका दृष्टा मानव है किन्तु चैतन्य सृष्टि में मानव इकाई के स्वतंत्र (स्वायत्त) होने की व्यवस्था है। यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ सबसे अलग होने से नहीं है, फिर स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? स्वतंत्रता का अर्थ है, अपने को सह-अस्तित्व सहज व्यवस्था में संगीतमय रुप में प्रमाणित करना। मानव इकाई में इसकी पूर्ण संभावनाएँ हैं तथा जागृत मानव ने स्वतंत्रता की अनुभूति भी की है।
- जड़ प्रकृति के साथ नियम पूर्वक उत्पादन, समाज में न्याय पूर्वक व्यवहार, स्वयं में समाधानपूर्ण विचार एवम् सत्ता में अनुभवपूर्ण क्षमता से सम्पन्न होना ही स्वतंत्रता का आद्यान्त लक्षण है। - अ.श. 217
मानव का वैभव अथवा परम वैभव सह-अस्तित्व में अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित करना ही कर्म स्वतंत्रता का तृप्ति है। यही जीवन जागृति का भी प्रमाण है। इसी का वैभव स्वाभाविक रूप में ही परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और उसकी निरंतरता परम्परा के रूप में चरितार्थ होना पाया जाता है। ऐसी परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी केवल परिवार मानव सहज अधिकार स्वत्व, स्वतंत्रता के आधार पर वैभव (व्यवस्था) प्रमाणित होता है। तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा परिवार मानव विधि से चरितार्थ हो पाता है। चरितार्थता का तात्पर्य मानवीयतापूर्ण चरित्र में ही नैतिकता अर्थात् तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षात्मक नीति का व्यवहारीकरण पूर्वक प्रमाणित होता है। व्यवहारीकरण स्वरूप को इस प्रकार समझा गया है कि हर व्यक्ति में तन, मन, धन रूपी अर्थ होता ही है। तन और मन के संयोग मानव में नित्य वर्तमान और प्रमाण है। आशा, विचार, इच्छा सहित ही हर प्रकार के कार्य-व्यवहार करता हुआ देखने को मिलता है। ऐसे कार्य-व्यवहार क्रम में ही चरित्र अपने-आप में स्पष्ट होता है।