मानवीयता पूर्ण चरित्र स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष दयापूर्ण कार्य-व्यवहार होना स्पष्ट किया जा चुका है। दयापूर्ण कार्य-व्यवहार में ही तन, मन, धन का सदुपयोग होना मूल्यांकित होता है। दया की मूल प्रक्रिया ही है जीने देकर जीना। जागृत मानव जीने देकर जीने में प्रमाणित रहता ही है। इसका सहज चरितार्थता परिवार मानव के रूप में ही सम्पन्न हो पाता है। ऐसे परिवार मानव रूपी अधिकार, स्वत्व और स्वतंत्रता का स्रोत अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन ही है। स्वायत्त मानव ही परिवार में व्यवस्था के रूप में जीकर प्रमाणित हो पाता है। यह परिवार व्यवस्था के रूप में ही गण्य होता है। ऐसे परिवार मानव समग्र व्यवस्था में अर्थात् विश्व परिवार व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करने योग्य हो पाते हैं। अतएव स्वायत्त मानव से परिवार मानव, परिवार मानव से ही व्यवस्था मानव, व्यवस्था मानव से ही समग्र व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करने का स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकार को स्पष्ट करता है। –अ.श. 218–219

‘चैतन्य इकाई का वातावरण के दबाव से मुक्त होना ही स्वतंत्रता है’

अधिकार: = मानवत्व सहित व्यवस्था व समग्र व्यवस्था में भागीदार –डायरी, २०००/ 265

मानवीयतापूर्ण आचरण करना, कराना एवं करने के लिये मत देना प्रत्येक मानव का मौलिक अधिकार है। मानवीयतापूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र और नैतिकता का अविभाज्य स्वरूप है। ‘मानव’ शब्द से प्रत्येक/सम्पूर्ण नर-नारी सम्बोधित हैं। - स.श. 127,128

  • अधिकार का तात्पर्य अनुभव बल के रूप में दृष्टव्य है। यही मानव अधिकार है। अनुभव बल को प्रमाणित करने का कार्य ही स्वत्व के रूप में देखने को मिलता है। ऐसे अधिकार और स्वत्व के सूत्रों पर व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी प्रमाणित होना ही स्वतंत्रता है। –अ.श. 218–219
  • स्वराज्य:

स्वराज्य का परिभाषा ही है स्वयं का वैभव को प्रमाणित करने का सम्पूर्ण दिशा-कोण-आयाम-काल-परिप्रेक्ष्य। वैभव का स्वरूप न्याय-सुलभता, उत्पादन सुलभता-विनिमय सुलभता ही है। ऐसे वैभव का नित्य स्रोत मानव कुल में शिक्षा-संस्कार, स्वास्थ्य-संयम कार्यप्रणाली है। – अ.श. 131

प्रत्येक मानव अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था (मानव धर्म) में भागीदारी निर्वाह करने, कराने एवं करने के लिये मत देने में स्वतंत्र है। अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था की अक्षुण्णता मानवीय शिक्षा-संस्कार, स्वास्थ्य-संयम, न्याय-सुरक्षा, उत्पादन-कार्य, विनिमय-कोष, सुलभता सहित है जिसका क्रियान्वयन दस सीढ़ी में होता है। 1. ‘परिवार’ सभा, 2. ‘परिवार समूह’ सभा, 3. ‘ग्राम परिवार’ सभा, 4. ‘ग्राम समूह’ परिवार सभा, 5. ‘ग्राम क्षेत्र’ परिवार सभा, 6. ‘मंडल’ परिवार सभा, 7. ‘मंडल समूह’ परिवार सभा, 8. ‘मुख्य राज्य’ परिवार सभा, 9. ‘प्रधान राज्य’ परिवार सभा और 10. ‘विश्व राज्य’।

परिवार सभा अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था की दस सीढ़ी हैं। सभी सीढ़ियाँ एक दूसरे के पूरक हैं और अविभाज्य हैं। अविभाज्यता का तात्पर्य इन दस सीढ़ियों में से किसी को अलग करना, अलग रखना, अलग सोचना ही संभव

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