एक आवश्यकता है। इसी से सर्वतोमुखी समाधान सबके लिये सुलभ होता है जिससे सार्वभौम शुभ नित्य समीचीन रहेगा।

6. मानव में, से, के लिये यह धरती एक अखण्ड है।

शून्याकर्षण की स्थिति में स्वयं स्फूर्त गति सहित एक सौरव्यूह और अनेक सौरव्यूह सहज व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करता हुआ यह सौभाग्यमयी धरती है। इस धरती में कहीं भी भाग विभाग नहीं है। सभी भाग-विभाग मानव के द्वारा बनायी गयी सीमाएँ हैं। यह धरती अपने में ठोस, तरल, वायु सहित रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना सहित चारों अवस्था के धारक-वाहक के रूप में प्रतिष्ठित है। हम इस सौर व्यूह में यही एक धरती को सौभाग्य सम्पन्न रूप में देखते हैं अर्थात् चारों अवस्था से सम्पन्न धरती को देख पाते हैं और कहीं ऐसा सौभाग्य सम्पन्न धरती नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा सौभाग्य सम्पन्न धरती हो उसमें से यह भी एक है। अन्य धरती के सम्बन्ध में हमें दौड़ने की आवश्यकता नहीं है, यह धरती में आवश्यकीय मानव जागृति, सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज रूपी परम्परा को प्रमाणित करना ही अभी इस धरती का मानव सहज कल्याण मार्ग है। इसका कारण यही है यह धरती को मानवकृत परेशानियों से दूर करने, और प्रकृति सहज नियमों को, जागृति सहज नियमों को नित्य निरन्तर पालन, आचरण और व्यवहार करता हुआ मानव मानस आज प्रमाणित होने की आवश्यकता है। यही सर्व प्राथमिक आवश्यकता है। इसके लिये धरती की अखण्डता और एकता को पहचानना एक आवश्यकता है। यह धरती भी समग्र व्यवस्था में अविभाज्य है। अतएव मानव अपने जीवन सहज जागृति परम्परा रूप में एकता, अखण्डता और सार्वभौमता को पहचानने के योग्य इकाई है। इसमें से एकता अखण्डता का मूर्त रूप यह धरती भी है। इस धरती को स्वस्थ रूप में बनाये रखना तभी संभव है जब मानव परम्परा जागृत हो जाए। भ्रम पर्यन्त अस्वस्थता की कहानी बन चुकी है।

8. मानव भाषा कारण, गुण, गणित के अर्थ में समान है।

मानव भाषा अपने स्वरूप में कारण, गुण और गणित है। इसे किसी लिपि पूर्वक संप्रेषित करें, इसका फलन एक ही होता है अर्थात् मानव की समझदारी, उसकी परंपरा के लिये भाषा प्रयुक्त होता है। कारण, गुण, गणित को किसी भी लिपि, किसी भी भाषा में संप्रेषित करने की स्थिति में उसकी सत्यता एक ही प्रकार से फलवती होती है। इस यथार्थ को समझने के उपरान्त सम्पूर्ण मानव में समझदारी की समानता का विश्वास होना अनिवार्य है। सर्वशुभ घटित होने के क्रम में समझदारी का यह भी एक आयाम है। इस विधि से सम्पूर्ण विवाद, अनर्थ प्रवृत्ति, और रहस्यता से मुक्त मानव परम्परा स्थापित होने के उपरान्त अपने-आप यह सब समाधान में परिणित हो जाते हैं। इसीलिये सर्वतोमुखी समाधान मानव के लिये समीचीन है।

Page 281 of 335