अपने में चिरआशित स्वराज्य को पाकर सुख, शांति, संतोष और आनन्द को पाकर; समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व को प्रमाणित करता है। यही मुख्य रूप में मानव का चाहत भी है। मूलत: धर्म एक शब्द है। हर शब्द किसी का नाम है। धर्म शब्द से इंगित वस्तु मानव जागृति और उसका प्रमाण रूपी प्रामाणिकता, सर्वतोमुखी समाधान ही है। इसका स्वीकृत स्वरूप ही सुख, शांति, संतोष, आनन्द है। इसका दृष्टा पद में भी सुख, शांति, संतोष आनन्द है। इसका दृश्य रूप ही व्यवस्था है। वह परिवार सभा से विश्व परिवार सभा तक गुँथे हुए स्वरूप में दिखाई पड़ती है। व्यवस्था सहज अभिव्यक्ति ही अथवा फलन ही समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व है। इस प्रकार जीवन सहज लक्ष्य, मानव सहज अर्थात् अखण्ड समाज सहज लक्ष्य, संगीत, विन्यास है, यही समाधान के रूप में निरूपित होती है। सह-अस्तित्व और अनुभव में संगीत है। यही आनन्द के नाम से विख्यात होता है। न्याय, उत्पादन, विनिमय, स्वास्थ्य-संयम, शिक्षा-संस्कार में होने वाला अनुभव ही सर्वतोमुखी समाधान है। यह मानव सहज जागृति की अभिव्यक्ति और संप्रेषणा है। सम्पूर्ण मानव अपने परिवार सहज आवश्यकता से अधिक कार्य करता है इसके फलन में समृद्घि का अनुभव होता है। यह भी समाधान है। हर परिवार सभा से विश्व परिवार सभा तक सम्बन्धों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन और उभयतृप्ति पाने की विधि जागृतिपूर्वक सम्पन्न होता है। यह निरन्तर समाधान है। लाभ-हानि मुक्त विनिमय प्रणाली जागृति सहज मानव की अपेक्षा है। इस विधि से विनिमय कार्य का क्रियान्वयन स्वयं समाधान है। स्वास्थ्य संयम, स्वाभाविक रूप में जीवन जागृति को शरीर के द्वारा मानव परंपरा में प्रमाणित करने योग्य शरीर है। यही स्वास्थ्य का निश्चित स्वरूप है। जागृतिपूर्ण परंपरा में सर्वमानव अपने स्वास्थ्य को स्वस्थ बनाये रखने का उपाय और स्रोत बना ही रहता है। यह स्वयं में समाधान है। प्रत्येक मानव मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक स्वायत्त मानव, परिवार मानव, विश्व परिवार मानव के रूप में प्रमाणित हो पाता है। यह सर्वतोमुखी समाधान है।
सर्वमानव नित्य समाधान का ही प्यासा है न कि समस्या का। समस्याओं से जूझते-जूझते आ रही विविध समुदाय रूढ़ियां और मानसिकताएँ मानव कुल को त्रस्त कर रखा है। हर मानव प्रश्न चिन्हों से घायल है। इससे छूटना हर व्यक्ति चाहता है। इसीलिये अखण्ड समाज उसकी अपेक्षा, उसकी आपूर्ति स्रोत, विधि, नीति, पद्घति सर्वसुलभ होना अति आवश्यक है। इस प्रकार मानव धर्म सर्वतोमुखी समाधान है। यह सर्वमानव के लिए आवश्यक है। इसकी संभावना नित्य समीचीन है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सर्वमानव का धर्म एक ही है।
मानव धर्म परम्परा के रूप में सहज ही अर्पित होता है, प्रवाहित होता है। इसी का नाम संस्कार है। संस्कार का तात्पर्य भी पूर्णता के अर्थ में किया गया कृतियाँ और स्वीकृतियाँ है। ऐसी स्वीकृतियाँ सार्थक होते हैं। इसी का नाम होता है सम्प्रदाय। सम्यक प्रकार से प्रदायन क्रिया, सम्प्रदाय है। मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार परंपरा ही पावन रूप में संस्कार है। ऐसी पवित्रता की धारक वाहकता केवल मानव में होना पाया जाता है। इस प्रकार मानव धर्म और मानव सम्प्रदाय सर्वशुभ के अर्थ में सार्थक होता है।
मानवीयतापूर्ण धर्म और सम्प्रदाय क्रियाकलाप में सम्पूर्ण अथवा प्रत्येक मानव का सम्मति अर्पित रहता ही है। इससे स्पष्ट हुई मानव धर्म, संप्रदाय और मत अविभाज्य रूप में गतित रहने वाली सर्वशुभ कार्यक्रम है। इसी के साथ यह भी हम अनुभव किये हैं कि सर्वतोमुखी समाधानपूर्वक ही मानव धर्म और परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सफल हो जाता है। यही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र भी है। अतएव, हम मानव मानवत्व के प्रति जागृत होना ही