श्रेय (जागृति) जिज्ञासु होने पर ही लुप्त-सुप्त कल्पनायें परिमार्जित होती हैं। फलत: दानवी व पाशवी प्रवृत्तियों से उदासीनता स्थिर होती है। साथ ही विवेकोदय होता है। श्रेय जिज्ञासा का उदय स्व-संस्कार, विधि-विहित अध्ययन तथा उसके अनुकूल वातावरण में होता है।
अवधारणा ही सद्विवेक है। सद्विवेक स्वयं में सत्यता की विवेचना है जो स्पष्ट है। मूलतः यही सर्वशुभ एवं मांगल्य है। सत्य में ही सम्यक-बोध होता है। असत्य ही कल्पना एवं भास होता है। हीनता, दीनता और क्रूरता से युक्त कर्म अशुभ होता है। स्व-मूल्य ही प्रवृत्ति और निवृत्ति का स्तुषि है। इसलिये असत्य, अभिमान तथा दर्प से मुक्त; सत्य, सरलता, सहजता तथा सौजन्यता से युक्त कर्म व उपासना श्रेय कारक है। सत्य कामना की निरन्तरता से लक्ष्य की अवधारणा होती है। ज्ञान में ही उत्पादन, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति प्रत्यक्ष है।
शक्ति-त्रय-जागरण (इच्छा-शक्ति, क्रिया-शक्ति तथा ज्ञान शक्ति जागरण) के बिना त्याग (भ्रममुक्ति) और प्रेम प्रमाणित नहीं होता। - क.द. 53-70
(iii) अभ्यास: शास्त्र, व्यवहार, कर्म, चिंतन
मानव जागृत होने के लिए अभ्यास करता है। यह क्रम जागृति पूर्णता तक रहता है।
क्यों, कैसे का उत्तर पाने के लिए किया गया बौद्धिक, वाचिक, कायिक क्रियाकलाप अभ्यास है। अर्थात् समाधान सम्पन्न होने के लिए अभ्यास है।
मूल प्रवृत्तियों के परिमार्जन पूर्वक कुशलता एवं पाण्डित्यपूर्ण व्यवहार ही अभ्यास का प्रधान लक्षण है।
मानव में व्यवसाय, व्यवहार एवं योगाभ्यास प्रसिद्ध है। व्यवसाय (उत्पादन) ही कर्माभ्यास, व्यवहार ही विचाराभ्यास एवं *योग ही चिंतनाभ्यास है।
क्रिया शक्ति में कर्माभ्यास, इच्छाशक्ति में व्यवहाराभ्यास एवं शास्त्राभ्यास तथा ज्ञान शक्ति में चिन्तनाभ्यास प्रसिद्ध है।
कर्माभ्यास से प्रतिफल, व्यवहाराभ्यास से सहअस्तित्व साक्षात्कार और चिन्तनाभ्यास से संस्कार में गुणात्मक परिवर्तन फलत: अनुभव है जो प्रत्यक्ष है। योगाभ्यास - मिलन का अभ्यास।
कर्माभ्यास पूर्वक भौतिक समृद्धि, व्यवहाराभ्यास पूर्वक बौद्धिक समाधान एवं चिन्तनाभ्यास और अनुभव पूर्वक परमानन्द की निरंतरता है।
चैतन्य शक्तियों की प्रखरता से परिपूर्ण होने के लिए चिंतन अभ्यास अनिवार्य है।
अमानवीयता की सीमा में संस्कार विकृत, मानवीयता की सीमा में सुसंस्कार एवं देव, दिव्य मानवीयता की कोटि में संस्कार पूर्ण होता है जो स्पष्ट है।