में गण्य है। जो इन प्रवृत्ति में रहते हैं, वे ही पशु मानव, राक्षस मानव में गण्य होते हैं। ये दोनों मानव विरोधी होना पाया जाता है। मानव विरोधी स्वभाव वाले शनै:-शनै: मानवीय स्वभाव में परिवर्तित होने की संभावना बनी रहती है। इसी आधार पर सार्थक शिक्षा का प्रस्ताव है, दूसरी भाषा में सहअस्तित्व वादी शिक्षा का प्रस्ताव है।
- <strong>धीरता</strong>
- का तात्पर्य मानव न्याय के प्रति सुस्पष्ट और प्रमाणित रहने से है। सुस्पष्ट होने के लिए अध्ययन और परंपरा ही एकमात्र आधार है। परंपरा, अध्ययन कार्य का धारक वाहक है, अध्ययन वर्तमान में होता ही रहता है।
- <strong>वीरता</strong>
- का तात्पर्य, स्वयं न्याय के प्रति निष्ठान्वित, व्यवहारान्वित, प्रमाणित रहते हुए लोगों को न्याय सुलभता के लिए अपने तन, मन, धन को अर्पित समर्पित करने से ही है। यह भी शिक्षा विधि से ही और लोक शिक्षा विधि से ही सार्थक होना पाया जाता है।
- <strong>उदारता</strong>
- का तात्पर्य है अपने में से प्राप्त तन, मन, धन रूपी अर्थ को उपयोगिता विधि से, सदुपयोगिता विधि से, प्रयोजनीयता विधि से उपयोग करना। उपयोगिता विधि का तात्पर्य शरीर पोषण, संरक्षण, और समाज गति में प्रयोग करना है। सदुपयोगिता का तात्पर्य अखण्ड समाज में भागीदारी करते हुए वस्तुओं का अर्पण-समर्पण करना है। प्रयोजनीयता का तात्पर्य सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करना है, वह भी स्वयं स्फूर्त स्वायत्त विधि से।
- <strong>दया</strong>
- का तात्पर्य पात्रता के अनुरूप वस्तुओं को उपलब्ध कराने की क्रिया से है।
- <strong>कृपा</strong>
- का तात्पर्य उपलब्ध वस्तु के अनुसार पात्रता को उपलब्ध कराना है। यह वस्तु के अनुरूप पात्रता के अभाव की स्थिति में हो जाना पाया जाता है।
- <strong>करुणा </strong>
- का तात्पर्य वस्तु भी न हो पात्रता भी न हो इन दोनों को स्थापित करने की क्रिया है। मनुष्य दया, कृपा, करुणा पूर्वक मानव, देव मानव और दिव्य मानव के रूप में वैभवित होना पाया जाता है। ऐसे वैभव देश, धरती, मानव के लिए अत्यधिक उपयोगी होना पाया जाता है।
हर रचना एक मात्रा है, इन मात्राओं में रूप विविधता आकार, आयतन के रूप में; गुण विविधता गति, कार्य और प्रवृत्ति के रूप में; स्वभाव विविधता चार अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न होने के रूप में, धर्म विविधता चारों अवस्थाओं में अलग-अलग होने के रूप में अध्ययनगम्य है। पदार्थावस्था अस्तित्व धर्म सम्पन्न है, जिसका नाश संभव नहीं है। प्राणावस्था, अस्तित्व सहित पुष्टि धर्म संपन्न है, इसका प्रमाण एक बीज अनेक में परिवर्तित होने की परंपरा है। बीज वृक्ष न्याय से ही संपूर्ण प्राणावस्था है। जीवावस्था, अस्तित्व पुष्टि सहित आशा धर्मी है।