(D) मध्यस्थ प्रभाव

अस्तित्व अक्षुण्ण रूप में मध्यस्थ विधि से ही कार्यरत है। इसीलिये अस्तित्व में अनुभव सहज फलन ही है मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ बल, मध्यस्थ शक्तियों का प्रभावित होना। मूलत: मध्यस्थ प्रभाव क्या है ? इसका उत्तर अस्तित्व में यही है सम-विषमात्मक अतिरेकों को सामान्य बनाए रखने में नियोजित बल और शक्ति। बल और शक्ति अविभाज्य हैं। ऐसी बल और शक्ति क्रिया का ही स्वरूप होना देखा गया है।

सम और विषम का नियंत्रण अथवा अतिरेकों का नियंत्रण परमाणु में निहित नाभिकीय अंश का वैभव होना स्पष्ट है। हर परमाणु में परिवेशीय अंशों का निश्चित दूरी से अधिक या कम होना ही सम-विषम संज्ञा है। यह सदा-सदा नाभिकीय बल और शक्ति के प्रयोग विधि से संतुलित रहना दिखाई पड़ता है -समझ में आता है। यह संतुलन परमाणु-गठन रूपी इकाई पर होने वाला ‘प्रभाव’ है। यही मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ बल और मध्यस्थ शक्ति का परिचय और प्रमाण है। क्योंकि हर परमाणु संतुलित होने की स्थिति में ही स्वभाव गति के रूप में वर्तमान होना, फलस्वरूप उपयोगिता-पूरकता विधि से परस्परता में विकास, उदात्तीकरण, रासायनिक उर्मि और रचना-विरचनाएँ स्पष्ट हुई। हर विरचना भी पूरकता क्रम में ही होना और पुनर्रचना के लिए पूरक होना देखा गया है। यह प्राणावस्था में बीजानुषंगीय विधि से स्पष्ट है।

भौतिक रचना में संतुलन का स्वरूप भार बंधन और अणुबन्धन के वैभववश अथवा वैभव के रूप में देखने को मिलता है। यही अणुएँ रासायनिक उर्मि सहित रासायनिक रचनाओं के रूप में प्रवृत्त रहना देखा गया है। ऊपर ‘बंधन’ का जो शब्द प्रयोग किया गया है यह चैतन्य प्रकृति में ही होने वाली भ्रम बन्धन के अनुरूप में नाम दिया गया है। नाम मानव ही देता है। किसी भी नाम का सृजेता मानव ही है। जबकि हर परमाणु स्वयं स्फूर्त विधि से अणु के रूप में, हर अणु स्वयं स्फूर्त विधि से रचना के रूप में वैभवित रहना देखा गया है। परमाणुओं में स्वभाव गति अंशों का स्वयं-स्फूर्त गठन (एक से अधिक अंश स्वयं स्फूर्त विधि से परस्पर अच्छी दूरी में रहकर कार्यशील रहना) उसके संतुलन सहित आंकलित होती है। स्वभाव गति का परिभाषा ही है यथा स्थिति में संतुलन, विकास में प्रवृत्ति। यही भौतिक-रासायनिक संसार में सम्पूर्ण क्रियाकलाप देखने को मिलता है। यह हर रचना-विरचना में होने वाला अध्ययन है। और विरचना भी पूरकता क्रम में सार्थक होना देखा जाता है। यह पूरकता भौतिक-रासायनिक रचना-विरचना के संबंध में है। क्योंकि अणु और अणु रचित रचनाएँ सम्पूर्ण अस्तित्व में यह दो ही प्रकार के रचना-विरचना होना सुस्पष्ट है। परमाणु का नियंत्रण तत्व परमाणु में निहित है और अणु का नियंत्रण तत्व अणु में ही निहित रहता है। रचनाओं का नियंत्रण तत्व रचनाओं में ही निहित रहता है। पूरकता विधि परस्परता में प्रभावशील रहता ही है। नियम से रचना, नियम से विरचना होना सुस्पष्ट है। यह पूरकता नियम रचना-विरचना रत रासायनिक-भौतिक संसार में देखने को मिलता है। सह-अस्तित्व नित्य प्रभावी है।

भौतिक-रासायनिक संसार क्रम में विकास क्रम को प्रकाशित करने के लिये सर्वाधिक पदार्थ रूपी द्रव्य और वस्तु प्रवृत्त रहना दिखाई पड़ता है। इसी क्रम में अत्यल्प वस्तु परमाणु भी गठनपूर्णता के लक्ष्य की ओर होना अस्तित्व के

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