ब्रह्मांडीय किरण क्रम में (भी) अनंत ग्रह-गोल, सौर व्यूह का परस्पर आदान-प्रदान अथवा परस्परता में प्रतिबिम्ब रहता ही है। हर बिम्ब का प्रतिबिम्ब रहता ही है। प्रतिबिम्ब अपने अस्तित्व को प्रस्तुत करता है। अस्तित्व नित्य वर्तमान, स्थिर और विकास और जागृति निश्चित होने के आधार पर सभी बिम्ब अपने-अपने आकार-प्रकार, वातावरण सहित अर्थात् हर वस्तु का अपना प्रभाव क्षेत्र बना रहता है। इसी आधार पर हर व्यक्ति अपने प्रभाव सीमा सहित एक-दूसरे पर प्रतिबिंबित रहता ही है। जैसे सूरज, चांद, तारागण इस धरती पर प्रतिबिम्बित रहते हैं और यह धरती इन सब पर प्रतिबिम्बित रहती ही है। हर बिम्ब का सभी ओर प्रतिबिम्बित रहना पाया जाता है। इसी क्रम में उन-उन ग्रह गोलों के प्रभाव के आधार पर आदान-प्रदान क्रम बना रहता ही है। यही ब्रह्मांडीय किरणों का तात्पर्य है।
रूप के आधार पर परस्परतायें नियंत्रित रहना परमाणु, अणु, अणु रचित पिंडों में देखने को मिलता है। रूप और गुण के आधार पर संपूर्ण प्राणावस्था की कोषा और कोषाओं से रचित सभी रचनाएँ नियंत्रित रहना स्पष्ट है। जीवावस्था के रूप, गुण, स्वभाव के आधार पर नियंत्रित रहना देखने को मिलता है। इसी आधार पर मानव का रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के आधार पर नियंत्रित होना समीचीन है। भ.व. 136
गुण की परिभाषा गण्यात्मक गति अथवा जिन गतियों की गणना की जा सकती है। जब गुण का तात्पर्य गति ही है, तब गति का ही नाम क्यों न प्रयोग में लाया जाए, गुण का नाम लेने का क्या आवश्यकता है? इसका सहज उत्तर यही है कि यह अस्तित्व सहज है। गुण शब्द से गति अवश्य इंगित होती है, परन्तु सम्पूर्ण की गणना नहीं होती है। गतियाँ सम, विषम, मध्यस्थ गति में समझने में मिलती हैं। सम गतियाँ विकास और गुणात्मक विकास के क्रम में प्रमाणित होती हैं। जबकि विषम गतियाँ गुणात्मक विकास के स्थान पर ह्रास घटना को स्पष्ट कर देती हैं। मध्यस्थ गति इन्हें संतुलित बनाए रखता है। अर्थात् यथास्थिति को बनाये रखने में, यथास्थिति को पोषण करने में, अक्षुण्ण बना रहता है। गुण शब्द में ये तीनों प्रकार की गतियाँ सम्बोधित हो पाती हैं। इसीलिए गुण शब्द का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि सम, विषम, मध्यस्थात्मक गति का संयुक्त नामकरण ही गुण है।
बल और गति, इस दिग्दर्शन में हैं। प्रत्येक वस्तु में बल संपन्नता का प्रमाण, अस्तित्व सहज है। सत्ता में संपृक्त होना ही बल संपन्नता का सूत्र, अस्तित्व में वर्तमान है। वर्तमान में सम्पूर्ण परमाणुओं का होना पाया जाता है। गति अपने में स्थानांतरण की व्याख्या है, परिवर्तन का सूत्र है। बल अपने स्थिति सहज व्याख्या है। इस प्रकार बल और शक्ति की अविभाज्य वर्तमान में ही परिभाषा और व्याख्या स्पष्ट है। यह मानव में, धरती में, परमाणु में, अनंत में घटित है। धरती में सूर्य स्थानांतरित होता हुआ देखने को मिलता है। सूर्य बिंब यथावत् ही दिखता है। सूर्य अपने सहज स्थिति व गति को स्पष्ट किया ही है, इसे देखा भी जा सकता है। इसलिए स्थिति और गति अविभाज्य है, इस बात को स्वीकार कर सकते हैं। बल स्थिति में और गति शक्ति में गण्य हो पाता है। बल को दबाव और शक्ति को प्रवाह के रूप में पहचाना गया है। दबाव स्थिति का तथा प्रवाह गति का द्योतक है। इसी के आधार पर विद्युत चुम्बकीय आदि बलों को अध्ययनगम्य और सार्वभौम रूप में देख चुके हैं अथवा देख सकते हैं। - भ.व. 268-269