देहवाद से भोगवाद, ईश्वरवाद से एकान्तवाद, भक्ति-विरक्ति के रूप में प्रचलित हुआ। एकान्त - जिसमें अकेले की महिमा, विशेषता, मोक्ष केवल अकेले के लिए संभव है, स्वर्गवाद - अकेले के लिए स्वर्ग। इन मान्यताओं और आश्वासन विधियों से केवल व्यक्तिवादी अहंता, उससे होने वाली लाभ-हानि मानव परम्परा में हाथ लगी। जबकि अकेले नाम की कोई स्थिति, गति नहीं है। अस्तित्व ही, सह-अस्तित्व है। हर मनुष्य का सह-अस्तित्व में वैभवित रहना स्वाभाविक है। सत्तामयता भी अकेले नहीं है, प्रकृति भी अकेली नहीं है। दूसरे के साथ ही एक, अपने वैभव को प्रमाणित करता है। सम्पूर्ण एक एक सत्ता में ही वैभवित है। सम्पूर्ण सत्ता, प्रकृति के साथ वैभवित है। इस तथ्य के साथ अकेले, कुछ भी नहीं है। सह-अस्तित्व ही सम्पूर्ण एक एक का और समग्र अस्तित्व का सूत्र और व्याख्या है।

जो शरीर को जीवन समझे, उनकी विधि से, भोगवाद पनपा। भोगवाद के साथ संग्रह - एक कड़ी बना। संग्रह का तृप्ति बिंदु नहीं मिला, सबके लिए संग्रह, संभव नहीं हुआ क्योंकि संग्रह की मात्रा का निर्णय संभव नहीं हो पाता। फलस्वरूप सबको संग्रह सुलभ ही नहीं बन पाया। युद्घ, विद्रोह, द्रोह, शोषण की मानसिकता और भी बलवती हुई है। इसी के चलते नैसर्गिक असंतुलन, प्रदूषण के आधार पर पनपता आया। यह किसी मनुष्य के लिए स्वीकृत वस्तु, स्वीकृत घटना नहीं है। इससे, मनोविज्ञान पर भी, पुनर्विचार करने की आवश्यकता बनी ही रही।

हम मानव प्रकारान्तर से, संतुलन, समृद्घि, समाधान और समाज न्याय को स्वीकारते आए हैं। चाहे हमें देहवाद (भोगवाद) और आत्मवाद का उपदेश देते रहें। इन दोनों विधियों से चला आया मानव सहज रूप से ही, स्वीकृति के स्वरूपों को, स्पष्ट करते आया। ऐसा मानव सहज स्वीकृति के अनुरूप, कोई निश्चित फलन, सर्वजनोपयोगी होने की विधि से निष्पन्न नहीं हो पाया। प्रयत्न विविध रूपों में होते आए। सभी प्रयास देहवाद और ईश्वरवाद (आत्मवाद) ही रहे हैं।

मानव संचेतना का अध्ययन ही शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में है। यह अध्ययनगम्य है। अस्तित्व में ही, व्यापक रूप में साम्य ऊर्जा नित्य वर्तमान है। इसे ईश्वर नाम दिया है। इस बात की चर्चा पहले हो चुकी है। अस्तित्व, जीवन और जीवन जागृति समझने के उपरान्त मानव परम्परा में मानव सहज सामाजिक अखंडता, मानव सहज व्यवस्था में सार्वभौमता समीचीन है। इसलिए भी मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान पर ध्यान देना आवश्यक रहा है।

मानव संचेतना का तात्पर्य ही संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता का संयुक्त रूप है जो जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करने का क्रियाकलाप है। इसी का अध्ययन है। इसमें पारंगत, निष्णात और प्रमाणित होने के अर्थ में मानव सहज संचेतना, उसका वैभव, प्रत्येक व्यक्ति में इसकी सार्थकता को स्पष्ट करना ही आशय है। दूसरे तरीके से मानव संचेतना का अध्ययन अर्थात् मानव के सम्पूर्ण आयाम, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्यों में सार्थकता का निरूपण, विश्लेषण और निष्कर्ष है। - म.वि. 18–22

शरीर संचेतना अथवा इंद्रिय सन्निकर्षात्मक प्रभावों को भी अनुभव कहना, प्रचलन में रहा है। जीवन संचेतना ही, शरीर जीवन्त रहने पर्यन्त प्रमाणित रहती है। जीवंतता का स्रोत जीवन ही है। जीवन द्वारा अपनी आशा विचार, इच्छा रूपी अक्षय शक्तियों का प्रभावन कार्य के आधार पर, शरीर को जीवंत बनाए रखना, एक सहज प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के आधार पर ही प्रत्येक मनुष्य, शरीर और जीवन में सह-अस्तित्व प्रतिष्ठा स्थापित होने, क्रियाशील रहने, शरीर यात्रा को सहज सुगम बनाए रखने और जीवन सहज उद्देश्यों को प्रमाणित करने का कार्य देखने को मिलता है।

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