इसका दृष्ट प्रमाण, शरीर का जीवंत रहना अथवा न रहना ही प्रधान घटना है। ऐसी घटना प्रत्येक मनुष्य के साथ और प्रत्येक मनुष्य में प्रमाणित होती है, यह सर्वविदित तथ्य है। ऐसी घटना, को, एक रासायनिक ऊर्मि के रूप में भी बुद्घिजीवी मानव ने दिखाने का प्रयत्न किया और कुछ मेधावियों ने आत्मा के नाम से इस घटना का विश्लेषण करने का प्रयास किया। यह अध्ययनगम्य हो नहीं पाया। – म.वि. 245
मनुष्य का अध्ययन (*भौतिक) वस्तु बोध के रुप में होना संभव नहीं हो पाया है। क्योंकि मनुष्य की संपूर्णता रासायनिक भौतिक सीमा में न होकर, अथवा रासायनिक भौतिक वस्तुओं की महिमा शरीर तक ही सीमित रहने के आधार पर, मानव का सम्पूर्ण अध्ययन होना संभव नहीं हुआ। हर मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रुप में ही विद्यमान है और परंपरा के रुप में वर्तमान है। परंपरा के लिए शरीर एक प्रधान आधार है। परंपरा का मतलब ही होता है पीढ़ी से पीढ़ी अथवा वंश परंपरा ही रहा है। शरीर परंपरा, रचना विरचना के आधार के रुप में ही सीमित है। जबकि मानव परंपरा में जीवन और शरीर संयुक्त वरीय स्थिति को प्रमाणित करता है। अर्थात् शरीर से अधिक महिमाओं को स्पष्ट कर देता है। शरीर हो, जीवन न हो, ऐसी स्थिति में मानव होता नहीं है। इसलिए मानव संज्ञा में जीवन और शरीर के संयुक्त रुप की ही स्वीकृति है। यह भी मानव की समझ में आ चुका है। शरीर ही जीवंत और निर्जीव होता है, निर्जीवता जीवन का वियोग ही है।
जीवंतता ही जीवन और शरीर का सम्यक प्रकाशन है, अभिव्यक्ति है। इसी क्रम में मानव संतुष्टि और जीवन संतुष्टि को पहचानना एक आवश्यकता रही है। मानव संतुष्टि के साथ जीवन संतुष्टि सार्थक होता ही है। इस तथ्य का अध्ययन पहले स्पष्ट हो चुका है। मानव संतुष्टि का लक्ष्य के रुप में होना, मानव जीवन सार्थक होता हुआ प्रमाणित होता है। इसी क्रम में मानव अध्ययन करने के लिए अनुभवमूलक विधि से अनुभवगामी पद्घति को अपना लिया। उसी का यहाँ स्पष्टीकरण और उल्लेख है। मानव का सहज विधि से जीवन तृप्ति का ध्यान इसीलिए आवश्यक है कि जीवन बल, शक्ति का नियोजन पूर्वक ही शरीर संरक्षण, पोषण, समाज गति स्पष्ट होती है। जीवन न होने की स्थिति में शरीर का संरक्षण, पोषण नहीं हो पाता है। इसके विपरीत ऐसे शरीर को मृत शरीर घोषित किया जाता है और विसर्जन किया जाता है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि शरीर, पोषण, संरक्षण जीवंतता पूर्वक ही संपन्न होता है। इसलिए जितना हम जान पाते हैं, उससे कम चाह पाते हैं, जितना हम चाह पाते हैं, उससे कम कर पाते हैं, जितना हम कर पाते हैं, उससे कम भोग पाते हैं। परिणाम पता लगता है कि भोगने की जहाँ तक सीमा है, वह शरीर ही है। -क.द. 127
जीवन रचना एक गठनपूर्ण परमाणु है, रासायनिक-भौतिक क्रियाकलापों में भाग लेने वाले परमाणुओं में जो श्रम-गति-परिणाम देखने को मिलता है उसमें से परिणाम का अमरत्व, गठनपूर्ण परमाणु में स्पष्ट होता है। यह परमाणु में विकास का एक सोपान है। प्रकृति में जीवन-क्रियाकलाप कभी समाप्त नहीं होती। जीवन नित्य है, शरीर जीवन प्रकाशन के लिये एक घटना के रूप में समीचीन रहता है। शरीर रचना के बारे में वंशानुक्रमीय विधि से गर्भाशय में