रचित होना देखा गया। इसलिये शरीर में आकार-प्रकार-रंग-रूप में विभिन्नता होना देखा गया है। जीवन रचना में परमाणु में गठनपूर्णता समान होना देखा गया है।
जीवन रचना समानता का तात्पर्य जीवन क्रियाकलाप के लिये जितने भी अंशों का परमाणु गठन में समाना आवश्यक रहता है वह सब इसमें समाये रहने के फलस्वरूप जीवन रचना में समानता को विधिवत् देखा गया है, समझा गया है। -क.द. 112-113
शरीर रचना के अनुसार मानव का पहचान होता ही नहीं, न कभी होगा। इसीलिए हमें जीवन में परिवर्तन पर ध्यान देना बनता है। परिवर्तन आज तक के प्रधान शोध, अनुसंधान से साकार होने की गतिविधियाँ सुस्पष्ट हो चुकी हैं। शेष भाग मन:स्वस्थता है, उसे सहअस्तित्ववादी दृष्टिकोण से सुस्पष्ट होने वाली ज्ञान, विज्ञान, विवेक सम्पन्नता पूर्वक अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी पूर्वक मानव आकांक्षा और जीवन आकाँक्षा को सार्थक बना सकते हैं। इसे हर नर-नारी प्रयोग पूर्वक प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं –क.द. 162
- यह बहुत आसान हो गया है कि मानव जीवन को पहचान सकता है। जीवन विद्या इसके लिए है। जीवन सहज समानता को प्रत्येक मानव में समझा जा सकता है। इसके लिए अध्ययन सहज विकल्प, ''परमाणु में विकास और जीवन ज्ञान” है। इन दोनों ऐश्वर्य से संपन्न होने के उपरान्त ईश्वर, देवता आत्मा जैसे रहस्यों से मुक्ति पाने का क्रम अस्तित्व दर्शन से बनता है और स्पष्ट होता है कि मानव ही विकसित और जागृत होकर देवी-देवताओं के पद में हो जाते हैं। ये सब अस्तित्व सहज अभिव्यक्ति क्रम में है। इसलिए मानव का इसको जागृति क्रम अथवा जागृति पूर्वक स्वीकारना सहज है। मानव कुल जागृत है इस बात का प्रमाण अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था ही है। इसमें भागीदारी के लिए जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान सहज परंपरा ही एक मात्र विकल्प है। इस नजरिए से किसी जीवन के अधिकारों को, स्वत्व को, स्वतंत्रता को हनन करना अव्यवस्था का द्योतक होता है। इसलिए जानवरों और मानवों का वध अव्यवस्था का द्योतक सिद्घ हुआ है। नियम-नियंत्रण-संतुलन, न्याय-धर्म-सत्य सहज विधिपूर्वक जीना ही सार्वभौमता और अखण्डता सूत्र है। – भ.व. 215
मनुष्य, जीवन और शरीर का संयुक्त रूप है। निरंतर सुखी होने के अर्थ में मानव का लक्ष्य समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व प्रमाणित होना ही है। इस सदी के अंत में मनुष्य जागृत है, अथवा जागृति के लिए इच्छुक और प्रयत्नशील है या आवश्यकता को महसूस करते हुए, लक्ष्य व दिशा विहीन है। दिशा, मानवीयतापूर्ण आचरण ही है। अथवा आवश्यकता को महसूस करने, प्रयत्नशील होने और जागृत होने के योग्य है। - म.वि. 41
- शरीर को सत्य समझकर (शरीर केन्द्रित) आस्वादन करने की स्थिति में, जीवन तृप्ति का स्रोत नहीं बन पाता। अतएव जीवन तृप्ति विधि से ही आस्वादन सार्थक होता है अर्थात् जीवन में, से, के लिए जीवन समझ में आने के बाद ही आस्वादन की सार्थकता, नियम और न्याय के रूप में निरंतर ही सुख, सुन्दर, समाधान के प्रमाणों सहित है। - म.वि. – 88