भ्रमित मानव मन की क्रियाएं सर्वाधिक मान्यताओं के आधार पर सम्पन्न होती हुई दिखाई पड़ती हैं। मान्यता का आधार शरीर, इन्द्रिय और इंद्रिय संवेदनाएं हैं। इन पर आधारित मान्यताओं से प्रत्येक मनुष्य समस्याग्रस्त रहता है। प्रामाणिकता के लिए मन अनुभव मूलक विधि से क्रियायों को संपन्न करता है। यह विचार, इच्छा, ऋतम्भरा, प्रमाण सहज क्रम में, जीवन जागृति का प्रमाण प्रस्तुत होता है। - म.वि. 37
- मानव परंपरा में जीवन प्रमाणित होने के लिए मानव शरीर की अनिवार्यता समझ में आती है। इस प्रकार अर्थोपार्जन के लिए तन एक महत्वपूर्ण वस्तु है। शरीर का उपयोग करने वाला वस्तु जीवन ही है। जीवन में से मन अधिकांश शरीर को उपयोग करता है। क्रम से अनुभव, बोध, चिंतन, तुलन सम्मत विधि से मन शरीर का उपयोग करता है तभी शरीर का सदुपयोग होना प्रमाणित होता है। शरीर की सुरक्षा के लिए जीवन सदा ही शरीर को जीवंत बनाए रखता है। मानव शरीर को जीवंत बनाए रखने में मन ही प्रयोजित रहता है। - आ.व. 53
वस्तुओं का उत्पादन, जीवन शक्तियों के संयोग से, शरीर के अवयवों द्वारा, श्रम नियोजन पूर्वक संपादित होती है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए, जन-मानस को यह भी विश्वास दिलाया है कि भौतिक वस्तु की आवश्यकता शरीर तक ही है। जीवन-तृप्ति के अर्थ में, उपयोग, सदुपयोग और प्रयोजनशीलता को स्पष्ट किया है। जीवन, शरीर के द्वारा, मानव परम्परा में अपनी जागृति को प्रमाणित करना ही परम उद्देश्य है। यही प्रयोजन है। इसे सार्थक बनाने के क्रम में, शरीर- यात्रा जीवन के लिए एक साधन है, न कि साध्य। - म.वि. 132-133
- शरीर का दृष्टा भी जीवन ही है इसलिये जागृत मानव ही हर समस्या का समाधान और उसका निरन्तर स्रोत होना पाया गया है, देखा गया है। मानव भ्रमवश शरीर को ही जीवन मानकर अपने सभी क्रियाकलापों को करता है-तभी वह सब किया गया का परिणाम समस्याओं के रूप में होती है। समस्याएँ मानव को स्वीकार नहीं है। विज्ञानियों के अनुसार शरीर ही जीवन होना बताया गया है। भ्रम का यही प्रधान बिन्दु है जबकि संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता का संतुलन-संगीत परमावश्यक है। हर मानव में संवेदनशीलता, संज्ञानशीलता का होना पाया जाता है। जैसे ऊपर कहे गये उदाहरण के आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि मानव अपने कर्म स्वतंत्रतावश विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी विधि से सामरिक दृष्टियों के और मानव में निहित सुविधा-संग्रह रूपी प्रलोभन की तुष्टि के लिये सम्पूर्ण पर्यावरण को दूषित कर दिया और धरती बीमार हो गई। यह विज्ञान सहज कर्म-स्वतंत्रता का फल है। पर्यावरण संतुलन सहज, संगीत सहज, अवधारणा और अनुभव होने के उपरान्त मानव अपने कर्म स्वतंत्रता को समस्याकारी कार्यों में नियोजित करना समाप्त हो जाता है। संज्ञानशीलता ही अनुभव सूत्र है-संवेदनशीलता ही कार्यसूत्र है। अनुभव ही ज्ञान-स्वरूप है। यह स्वयं नित्य समाधान और प्रामाणिकता है। अनुभवमूलक सभी कार्यकलाप सत्य, समाधान और न्याय के रूप में प्रमाणित होता है। न्याय को हम नैसर्गिक और मानव संबंधों के साथ अनुभव किये हैं। इसे हर मानव अनुभव करने योग्य इकाई है, इसकी आवश्यकता सदा-सदा ही बना है।