- मानव परंपरा में अनुभवमूलक अभिव्यक्ति ही ज्ञानावस्था का सार्थक, आवश्यक, वांछित कार्य होना देखा गया है। इसी आधार पर अनुभवमूलक विचार के रूप में इस ग्रन्थ को प्रस्तुत करने की आवश्यकता निर्मित हुई। - आ.व. 14–15
- जागृति का प्रमाण मानव ही है। मानव ही जीवन सहज जागृति को दृष्टा, कर्ता, भोक्ता के रूप में प्रमाणित करता है। प्रमाणित करने के मूल वस्तु के रूप में अस्तित्व दर्शन रूपी परमदर्शन, जीवन ज्ञान रूपी परम ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी परम आचरण को प्रमाणित करता है करने योग्य है। - अ.श. 79-80
जीवन ज्ञान जब तक नहीं होता रहा, तब तक हम यह मानने के लिए तैयार थे, बाध्य थे कि वंश के अनुसार रूप, गुण, संस्कार होते हैं। इस प्रकार की मान्यता के साथ जातिवादी, वंशवादी श्रेष्ठता की बहस और वकालत पहले चली। ये सब आज की स्थिति में टूट चुकी है। ब्रह्मवाद, आत्मवाद, जातिवाद, नस्लवाद ये सभी वाद विवादग्रस्त हो चुके हैं। फलस्वरूप, शंकाओं का घेरा बलवती होता जा रहा है। शरीर रचना के आधार पर चेतना निष्पन्न होने, बहने का जो आश्वासन था, वह भी विवादग्रस्त हो गया। अब आदमी कहाँ जाय, यही मुख्य मुद्दे की बात है। इसी 21वीं शताब्दी के पहले दशक तक 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक से शुरु हुई, एक विकल्पात्मक प्रस्ताव, सहअस्तित्ववादी विश्व दृष्टिकोण, मानव को एक अखण्ड समाज के रूप में, जाति, धर्म समझ अर्थात् ज्ञान, विज्ञान, विवेक और जीवन अर्थात् चैतन्य इकाई में समानता, अक्षय शक्ति, अक्षय बल के समानता और जागृति के स्वरूप में समानता को बोध कराने के लिए अध्ययन विधि प्रस्तुत हो चुकी है।
- इसी क्रम में जीवन तृप्ति और मानव तृप्ति की एकरूपता को पहचानने की आवश्यकता है, सार्थक बनाने की आवश्यकता है। इस विधि से अर्थात् सहअस्तित्ववादी नजरिये से मानव शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में विद्यमान है, प्रकाशमान है। ऊपर कही सारी कहानी के तात्पर्य में मानव शरीर में कोई विकास हुआ नहीं और शरीर में कोई विकास होता नहीं। जो कुछ भी महिमा आदि मानव से अत्याधुनिक मानव तक प्रकाशित हुई है, यह सर्वमानव में पाए जाने वाली कर्मस्वतंत्रता, कल्पनाशीलता की अभिव्यक्ति है, यह भी स्पष्ट हो गई है। इसके तृप्ति बिन्दु को शोध, अनुसंधान करते हुए अर्थात् कर्म स्वतंत्रता का शोध अनुसंधान करते हुए, सुखी होने की आकाँक्षा ही है, इसी क्रम में मनाकार को साकार करना सार्थक हो गया। यह कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता की अभिव्यक्ति जीवन की महिमा है, न कि शरीर की। क्योंकि, शरीर प्राणावस्था की द्रव्य वस्तु, प्रक्रिया से ही सम्पादित हुआ है। ये पूरा रचना प्राणकोषा प्रधान है। ये प्राणकोषाऐं अपने क्षमता से अधिक होना संभव नहीं। मानव शरीर रचना के लिए जितना औकात स्थापित हुई, वह यथावत दोहराता हुआ दिखाई पड़ती है। कर्मस्वतंत्रता, कल्पनाशीलता, मानसिकता जो सर्व मानव में देखने को मिल रहा है। यह मानसिकता मूल स्वरूप में जीवन जागृति की ही एक प्रक्रिया है। - क.द. 50